28
Dec
Posted by विनय in मेरी ग़ज़ल. Tagged: चाँद, धूप, इश्क़, heart, love, light, eyes, मौसम, प्यार, याद, ग़म, मोहब्बत, चाहत, वफ़ा, पूनम, शाम, तमन्ना, बर्फ़, desire, missing, wish, azure, friend, memory, आसमाँ, morning, season, moon, moonlit, warm, rain, sky, evening, sunlight, sorrow, tension, lover, सहर, reason, ज़हर, poison, ख़ातिर, बरसात, meeting, dust, heat, आँख, बाइस, दीप, candle, मेहबूब, dear, विसाल, togetherness, assignation, ख़ाक, dawn, ice, गरमी, आजिज़, bothered, बे-तस्कीं. Leave a Comment
दीप जलाओ रात को पूनम कर दो
मेहबूब की यादों से आँखें नम कर दो
तमन्ना को हसरते-विसाल है
ज़हर दे दो मुझे यह करम कर दो
शाम की ख़ाक गिरने लगी है आसमाँ से
मेरे ख़ातिर में सहरे-ग़म कर दो
बर्फ़ की गरमी से आजिज़ आ चुका मैं
बे-तस्कीनियों की धूप गरम कर दो
चाँद के छुपने का बाइस मैं कैसे कहूँ
‘वफ़ा’ आज बरसात का मौसम कर दो
शायिर: विनय प्रजापति ‘वफ़ा’
लेखन वर्ष: २००३