25
Dec
Posted by विनय in मेरी ग़ज़ल. Tagged: abhorrence, aversion, अदू, अग़ियार, आइन्दा, इख़्तलात, इल्तिफ़ात, इश्क़, एहतिआत, जन्नत, जहन्नुम, नजात, नशात, नाफ़िक्र, नफ़रत, प्यार, मशगूल, मोहब्बत, मौत, रहम, वबा, care, careless, caution, death, dedicated, demise, desease, disgust, enemy, envy, foe, free, friendship, future, happy, heaven, hell, kindness, love, stranger. Leave a Comment
वबाए-इश्क़ से नजात कैसे हो
नफ़रत हो तब इल्तिफ़ात कैसे हो
जन्नत है गर जहन्नुम-सी
फिर तेरे अग़ियार हो नशात कैसे हो
मशगूल हूँ इस क़दर तुममें
अपनी मौत से भी एहतिआत कैसे हो
आइन्दा से नाफ़िक्र हूँ आज मैं
मुझसे बेहतर अदू की बात कैसे हो
‘नज़र’ पे ख़ुदा भी न रहम खाये
गर उसे हो भी तो इख़्तलात कैसे हो
शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००३