और कैसे रक़ीब के यार हमसे पेश आते

December 25, 2007 at 3:04 pm (मेरी ग़ज़ल) (, , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , )

और कैसे रक़ीब के यार हमसे पेश आते
वह हमसे अय्यारी नहीं तो और क्या फ़रमाते

हमारी क़िस्मत में जीते-जी फ़ना होना लिखा था
क्योंकर न हम अपने रक़ीबों से मात खाते

मैं ही मिला अपने ख़ुदा को इस सबके लिए
हरीफ़ाना क्योंकर न मेरे रक़ीब पेश आते

न कोई यार है न कोई दुश्मन किसी का
अपने-अपने मतलब के लिए सब हाथ हैं मिलाते

क्यों दिल के टुकड़ों से अब भी आह निकलती है
किसके पास सच्चे दोस्त हैं, किसको समझाते


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००३

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