आदाब तुझे ऐ मेरे वतन लखनऊ

December 25, 2007 at 2:41 pm (मेरी ग़ज़ल) (, , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , )

आदाब तुझे ऐ मेरे वतन लखनऊ
आदाब तुझे मेरे जानो-तन लखनऊ

है कभी आईना कभी शराब-सा तू
है मेरी शोख़ी मेरा बाँकपन लखनऊ

है तू ही मुस्लमाँ और तू ही है हिन्दू
निकहते रहे तेरे गुलशन लखनऊ

लहज़ा लुत्फ़ ज़ुबाँ और मेरी यह ख़ू
हर चीज़ है जैसे मेरा चमन लखनऊ

है जन्नतो-इरम इसमें हर कू
लहू में दौड़ता है जाने-मन लखनऊ


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००३

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