और कैसे रक़ीब के यार हमसे पेश आते
वह हमसे अय्यारी नहीं तो और क्या फ़रमाते
हमारी क़िस्मत में जीते-जी फ़ना होना लिखा था
क्योंकर न हम अपने रक़ीबों से मात खाते
मैं ही मिला अपने ख़ुदा को इस सबके लिए
हरीफ़ाना क्योंकर न मेरे रक़ीब पेश आते
न कोई यार है न कोई दुश्मन किसी का
अपने-अपने मतलब के लिए सब [...]
Archive for December 25th, 2007
25 Dec
और कैसे रक़ीब के यार हमसे पेश आते
25 Dec
सूखे हुए तिनकों को आशियाँ कहिए
सूखे हुए तिनकों को आशियाँ कहिए
जो सबपे खुला हो उसको निहाँ कहिए
ज़ुल्म को अपने इम्तिहाँ कहिए
जो बार-बार मिले उसको जाँ कहिए
मरज़ी आपकी मुझको बेवफ़ा कहिए
यह न कहिए तो और क्या कहिए
जो याद आता हो रह-रहके आपको
उसको ज़हर बुझाया पैकाँ कहिए
शिकन सिलवटें सब आँखों में रखिए
फिर ख़ुदा से फ़रियादो-फ़ुग़ाँ कहिए
जिस पर हर कोई सजदा बिछाये
उसको महज़ [...]
25 Dec
आदाब तुझे ऐ मेरे वतन लखनऊ
आदाब तुझे ऐ मेरे वतन लखनऊ
आदाब तुझे मेरे जानो-तन लखनऊ
है कभी आईना कभी शराब-सा तू
है मेरी शोख़ी मेरा बाँकपन लखनऊ
है तू ही मुस्लमाँ और तू ही है हिन्दू
निकहते रहे तेरे गुलशन लखनऊ
लहज़ा लुत्फ़ ज़ुबाँ और मेरी यह ख़ू
हर चीज़ है जैसे मेरा चमन लखनऊ
है जन्नतो-इरम इसमें हर कू
लहू में दौड़ता है जाने-मन लखनऊ
शायिर: विनय प्रजापति [...]
25 Dec
नामंज़ूर थी पेशकश तुम्हें दिल की
नामंज़ूर थी पेशकश तुम्हें दिल की
कैसे दिखाऊँ तुम्हें उल्फ़त दिल की
मजरूह तेरे प्यार ने मुझको किया
देख क्या हालत हो गयी मेरे दिल की
यह ज़ौक़े-दर्द वह नख़्वत तेरी
कब छुपी है तुमसे हसरत दिल की
यह बेसदा आँखें कुछ कहती हैं सुनो
सुन रहे हो तुम बात ग़लत दिल की
ख़ुशामद में मेरे कितने ही दिन गये
मगर न हुई इनायत [...]
25 Dec
कितने ही ज़ख़्म चाक हुए तेरे जाने के बाद
कितने ही ज़ख़्म चाक हुए तेरे जाने के बाद
हुए तेरी हसरत में मुए तेरे जाने के बाद
सोहबत किसी दोस्त की रास न आयी हमें
अजनबी से दोस्तों में रहे तेरे जाने के बाद
जब भी पहलू में किसी के यार को देखा हमने
ख़ाहिश तेरी करते रहे तेरे जाने के बाद
दिल का हर टुकड़ा हर एक साँस पे [...]




















कहते रहें Comments