शीशाए-अश्क आते रहे

December 18, 2007 at 7:19 pm (मेरी ग़ज़ल) (, , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , )

शीशाए-अश्क आते रहे क़तरा-क़तरा लहू रुलाते रहे
हम दीवानों की ख़ैर भला कौन पूछे लोग आते-जाते रहे

हम रखते हैं दोस्ती का पास हर दफ़ा कोई रखता नहीं
बेवजह हम पे लोग ग़लत इल्ज़ाम लगाते रहे

हमने सुना था दर्द की मिसरी बहुत मीठी होती है
जो लोग भी हमसे मिलने आये थोड़ी-थोड़ी साथ लाते रहे

ख़ुदा हाफ़िज़ तो एक बार किसी भी जाने वाले ने न कहा
उल्टे हमारी शमशीर से अपनी तलवारें लड़ाते रहे

बुरा न मान ज़माने का ‘वफ़ा’ मेरे ये सब एक जैसे हैं
अपनी बाइसे-बद्-निअ़त तेरे दिल को दुखाते रहे


शायिर: विनय प्रजापति ‘वफ़ा’
लेखन वर्ष: २००४

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