Archive for December 18th, 2007

सिफ़र के सिवा दिल में कुछ नहीं

सिफ़र के सिवा दिल में कुछ नहीं
जाना कहाँ है पता हमें कुछ नहीं
आसमाँ पर आशियाने का ख़ाब था
बनता   टूटे आसमाँ में  कुछ नहीं
हैं झील-सी गहरी शफ़्फ़ाक आँखें
जुज़  दर्द   के   इन में   कुछ    नहीं
दिल  के  ग़ुबार  दफ़्न  नहीं  होते
पर अदू से मिलने में कुछ नहीं
मैं कब बदला हूँ जो वो बदलेगा
इन छोटी-छोटी बातों में कुछ [...]

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तर क्यों है आँख लहू में

दीवाना  यह  सरफ़रोश  है
लहू   में  गर्मिए- जोश   है
हूँ दीवानगी से निशाने पे
ख़ुदी में सैय्याद मद्होश है
मुझे वो इल्ज़ाम दे रहा है
और मेरी  ज़बाँ ख़ामोश है
सर जिससे  कर  बैठे  हो
वो मेरे दुश्मन का दोश है
तुम बिन जहाँ चैन आये
वो रोज़े-जज़ा का आगोश है
मुझ मान्निद है जो तन्हा
वही शख़्स ख़ाना-बदोश है
तर  क्यों है आँख लहू में
तुम्हें  इसका  कुछ  होश  [...]

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मत करो तज़किरे

मत करो तज़किरे मेरी मोहब्बत के
दिन फिर गये तेरी मेरी सोहबत के
दिले-ज़ोफ़ में वह हौसला अब कहाँ
कैसे बिताऊँगा दिन तुमसे फ़ुर्क़त के
ख़ुद ख़ुदा भी आ जाये तो मैं ना कहूँगा
न चाहिए अब दिन यह जन्नत के
मेरी दुआओं का असर फ़ीका न जाये ख़ुदा
मिला दे तुमसे दिन आयें क़ुर्बत के
नज़र है तुमको यह जान भी मेरी
तुम [...]

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कहने को तूने

कहने को तूने बहुत कुछ किया था
मगर जिसने दग़ा किया वो ख़ुदा था
मैं जब उठा था सहर ख़ुशरंग थी
जाने क्या कुछ न होने को बदा था
ज़ौर यह हमसे रखते हो मेहरबाँ
किस अदू से जा दिल तेरा लगा था
हक़ीक़त की परदापोशी ठीक नहीं
मेरा तो तेरे का’बे में सजदा था
तेरे नाज़ में मुआ जाता है ‘नज़र’
देखके तुझको [...]

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शीशाए-दिल

प्यास का मारा जाये तो जाये किधर
इधर  है  का’बा  सनमख़ाना  उधर
दिन गिनते-गिनते गुज़र गयीं रातें
देखिए क्या असर दिखाए असर
वक़ालत क्या करें बीमारिए-दिल की
सद्-अफ़सोस में है ख़ानाए-जिगर
शीशाए-दिल जब निकले सींकर सरे’आम
नासेह ने कहा वाइज़ हुए हो ‘नज़र’
शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००४

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