गर तुम मेरे हमसफ़र होते
हसीन यह सभी मंज़र होते
खु़शबुओं का इक गुलिस्ताँ होता
ठण्डी छाँव वाले शज़र होते
तुम्हारी आँखों में हम डूब जाते
दीन-दुनिया से बेख़बर होते
बाज़ि-ए-जाँ आज भी लगा सकते हैं
लेकिन तब न यह डर होते
शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
17 Dec
गर तुम मेरे हमसफ़र होते
हसीन यह सभी मंज़र होते
खु़शबुओं का इक गुलिस्ताँ होता
ठण्डी छाँव वाले शज़र होते
तुम्हारी आँखों में हम डूब जाते
दीन-दुनिया से बेख़बर होते
बाज़ि-ए-जाँ आज भी लगा सकते हैं
लेकिन तब न यह डर होते
Posted by ravi rai on October 27, 2009 at 12:06 AM
kya kavita hai