गर तुम मेरे हमसफ़र होते

गर तुम मेरे हमसफ़र होते
हसीन यह सभी मंज़र होते

खु़शबुओं का इक गुलिस्ताँ होता
ठण्डी छाँव वाले शज़र होते

तुम्हारी आँखों में हम डूब जाते
दीन-दुनिया से बेख़बर होते

बाज़ि-ए-जाँ आज भी लगा सकते हैं
लेकिन तब न यह डर होते


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’

One Response to this post.

  1. Posted by ravi rai on October 27, 2009 at 12:06 AM

    kya kavita hai

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