Archive for December 17th, 2007

खा़ब

हसरते-  दीदार   मैं   कैसे   छोड़   दूँ
अपना दिल अपने हाथों कैसे तोड़ दूँ
जान हो तुम ज़ीस्त है तुमसे यारा
दामने-  ज़िन्दगी   मैं   कैसे   छोड़   दूँ
एक   दरया   इन   आँखों   से  बहता है
बेवज़ह रुख़ इसका मैं कैसे मोड़ दूँ
तेरा जो खा़ब आँखों में सजा रखा है
बतलाओ तो वह खा़ब मैं कैसे तोड़ दूँ
शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’

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कभी ख़त आये

कौन मिलाए तुमसे मुझे
खु़शियाँ दिलाए तुमसे मुझे
आँखें खा़री झील बन गयीं
यूँ दर्द आये तुमसे मुझे
चाँद भी रश्क़ करता है
जो क़रीब पाये तुमसे मुझे
कभी ख़त आये तुमसे मुझे
खु़दा मिलाए तुमसे मुझे
शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’

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फ़ैज़ न देखा

हमने मुहब्बत में ज़ियाँ और फ़ैज़ न देखा
तुम्हें जो देखा फिर शबो-रोज़ न देखा
सीधे निकल गयी जिगर के पार नज़र
किसी की नज़र को हमने इतना तेज़ न देखा
निगाह ढ़ूँढ़ती रही तुम्हें हर चेहरे में
मगर हमने तुम-सा एक हनोज़ न देखा
तुम्हें ही ढ़ूँढ़ता माज़ी के पन्नों में शीना
हमने बेफ़रदा यह इमरोज़ न देखा
शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’

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तदबीर

न अब कोई सितम मेरी महब्बत में हो
है जो असली मज़ा वह तेरी सोहबत में हो
है जो दिन-रात राहत मुझे सो तुमसे है
बचा लेना तुम गर दिल मेरा मुसीबत में हो
छेड़-छाड़ ज़रूरी है कभी-कभी इख़लास में
थोड़ा बहुत रंग यह भी तबीयत में हो
तर लहू से ख़त मैं भी कभी तुमको लिखूँ
गर इस तरह ही दिल [...]

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दिल में दर्द हो थोड़ा और…

ता-दमे-आख़िर लबों पे तेरा नाम आये
तू मिलने आये अगर दिल को आराम आये
रोशनी होगी अगर तुम-सा चाँद आये
तेरे रू-ब-रू लबों पे दिल का कलाम आये
हरगिज़ न होगा किसी को देख आह भरूँ
कभी तो आपके हुज़ूर में मेरा सलाम आये
दिल में दर्द हो थोड़ा और… थोड़ा और…
किसी तरह तो ग़म आपका मेरे काम आये
किसी रोज़ मैं [...]

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