नहीं कोई दोस्त मेरा न सही
रक़ीबों से मिल के दिल हल्का करते हैं
सैलाबे-क़लक़ चढ़ता जाता है
पैमाने दर्द के रोज़ छलका करते हैं
शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००३-२००४
16 Dec
Posted by विनय in रुबाइयाँ. Tagged: इश्क़, दर्द, दोस्त, प्यार, मोहब्बत, रक़ीब, क़लक़, enemey, foe, friend, love, pain, trouble. Leave a Comment
नहीं कोई दोस्त मेरा न सही
रक़ीबों से मिल के दिल हल्का करते हैं
सैलाबे-क़लक़ चढ़ता जाता है
पैमाने दर्द के रोज़ छलका करते हैं
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