Archive for December 16th, 2007

तुम्हीं से

प्यार है तुमसे तुम्हीं से सिर्फ़ तुम्हीं से
मेरी बेक़रारियों को क़रार है तुम्हीं से
सहर-शब सुबहो-शाम सब तुम्हीं से
सीने में दिल दिल में धड़कन तुम्हीं से
मेरी मंज़िल मेरा मुक़ाम मेरा हौसला तुम्हीं से
मेरी इन्तिहाँ मेरा अंजाम है तुम्हीं से
तुम हो जाने तमन्ना मेरी तमन्ना तुम्हीं से
‘नज़र’ को ज़ीस्त ज़ीस्त को जीवन तुम्हीं से
शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’

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दर्द दिल में दबाये बैठे हैं

एक मुद्दत से ज़ख़्मों को छुपाये बैठे हैं
हिज्र का दर्द दिल में दबाये बैठे हैं
क्या तदबीर तुमसे वस्ल को बनाऊँ मैं
दिल जानो-जिगर तुम पर लुटाये बैठे हैं
दिल से शिक़ायत हमें बहुत है मगर
क्या करें उसका तुमसे लगाये बैठे हैं
किसी राह किसी मोड़ पर तुम मिलोगे
हर रहगुज़र में नज़रें बिछाये बैठे हैं
शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’

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तन्हाई करती है तरफ़दारी और

तेरी यादों से बढ़ती है बेक़रारी और
तुमको भुलाने से चढ़ती है खु़मारी और
खींचे हैं सर्द रातों तक धूप के कोने
आपकी तस्वीर लगती है प्यारी और
धुँधला-सा दिखता चाँद बादलों के पीछे
बोझ सीने पे रखती है साँस भारी और
तुमसे मिलके सुलझाऊँ मसले दिल के
तन्हाई   करती    है   तरफ़दारी   और
शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’

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होगा ये वक़्त भी रुख़्सत ज़रूर

असरकार होगी मेरी मुहब्बत ज़रूर
मुट्ठी अपनी खोलेगी क़िस्मत ज़रूर
चुपके से आये थे तुम मेरी ज़िन्दगी में
मानी ये तुमसे होनी है सोहबत ज़रूर
माना गर्दिश में हैं सितारे अभी लेकिन
होगा ये वक़्त भी रुख़्सत ज़रूर
‘नज़र’ को है चाहत बस इक तुम्हीं से
करेगा मेरा रब मेरी मदद ज़रूर
शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’

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खिले इस तरह तेरे रंग और रूप

खिले इस तरह तेरे रंग और रूप
जैसे सर्दियों की भीनी-भीनी धूप
अब यह आलम है दिलो-ज़हन का
करता हूँ हर शै में तुझे महसूस
शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००३-२००४

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