याँ न ज़र्रा ही झमकता है फ़क़त१ गर्द के साथ
जल्वागर नूर है ख़ुरशीद२ का हर फ़र्द३ के साथ
ज़ख़्म की तरह ज़माने में तू काट अपनी उम्र
ख़ंदा४ या गिरिया५ जो कुछ होवे सो टुक६ दर्द के साथ
क़द्र नहीं दौलते-बे-सई की७ तुझको वरना
ज़र८ को निस्बत९ नहीं आशिक़ की रुख़े-ज़र्द१० के साथ
तेग़े-चोबी से कहाँ क़ब्ज़े-फ़ौलाद हो नस्ब११
न रहे [...]
Archive for December 4th, 2007
4 Dec




















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