वक़्त गुज़रा किया पल-पल आदतन

मैं ईज़ा1 में पड़ा नदामत2 को तड़पता रहा
जैसे शोला बुझती आग में भड़कता रहा

मैं कमरे में बैठा खोया रहा तेरे ख़्यालों में
और चौखट का दरवाज़ा खड़कता रहा

जैसे कभी बरखा के बादल बरसते नहीं
वैसे वो सारा दिन बर्क़-सा कड़कता रहा

तुमने जिसे बेजान समझ के ठुकरा दिया
वो दिल तेरे बाद तेरे नाम से धड़कता रहा

वक़्त गुज़रा किया पल-पल आदतन, पर’
फिर भी वो लम्हा आँख-सा फड़कता रहा

1. कष्ट या दु:ख; 2. पश्चाताप


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००५

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