Archive for December 1st, 2007

मुस्कुरा दो

मुस्कुरा दो’ मुस्कुराने में क्या हर्ज़ है
उतारता हूँ रोज़ जिसे तुम्हारा क़र्ज़ है
लाख बद्-ज़ुबाँ होगी’ दिल खुश्क होगा
एक पुराने लिफ़ाफ़े में तुमसे ये अर्ज़ है
हज़ार बहाने करना’अश्कों में आँख डबोना
हमसे वफ़ाए-जफ़ा तेरे दिल का मर्ज़ है
इक तूफ़ान था जिसके भँवर में डूब गये
ऐसे फ़र्ज़ निभाना मेरे दिल का फ़र्ज़ है
शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००२

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रह-रह के आता है ख़्याल आपका

रह-रह के आता है ख़्याल आपका
जब भी भुलाना चाहूँ नाम आपका
यह जो बद्-ज़ुबान है दिल मेरा
बार-बार दोहराता है सवाल आपका
शाम को सवेरों के उफ़क़ ढूँढ़ता हूँ
जब भी याद आये जमाल आपका
रात जब नींद गिरे आँखों में
पलकों पे दस्तक दे ख़्वाब आपका
शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००२

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हमने कब कहा कि मोहब्बत नहीं है

हमने कब कहा कि मोहब्बत नहीं है
तुमसे इक बात है जो मोहब्बत ही है
तुम जब भी गुज़रती हो मेरे सामने से
चेहरा देखना ख़ुदा की इबादत ही है
जिस दिन भी तुमने मुस्कुराया नहीं
वो तुम्हारे दिल की इक शरारत ही है
हमने जो कुछ कहा और किया है
उसमें भी शामिल तुम्हारी इजाज़त ही है
अब रोज़ ही खिंचती है [...]

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तन्हाइयों से ग़म नहीं

तन्हाइयों से ग़म नहीं हम* मिला है
जा^ में दूसरा कोई नहीं सनम मिला है
दूर तक जाके नज़र लौट आती है
ऐसा ये फ़ुर्क़त का मौसम मिला है
अजनबी-से चेहरे आँखों में आते हैं
आँखों को न जाने कैसा मरासिम मिला है
कब वो शामें लौटेंगी कब वो आयेगा
जिससे इश्क़ का हर सितम मिला है
* स्वयं ज्ञान ^जगह, दुनिया
शायिर: विनय [...]

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यह चाँद भी आपजबीं होता है

यह चाँद भी आपजबीं* होता है
जब दीदारे-दिलनशीं होता है
कभी रात में महकते हैं बेले
जो नुमाइशे-महजबीं होता है
तारे भी गुल बनके खिलते हैं
जो साथ में हमनशीं होता है
धीरे-धीरे सहर भी आती है
जब साथ कोई जाँनशीं होता है
*अपने आप दमकना
शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००२

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