मेरा दर्द मेरा दु:ख मेरा अपना है
बाक़ी सब झूठ है यह सच्चा सपना है
कल तक लबों पर उसके लिए दुआ थी
आज दुआ में थोड़ा कुछ हिस्सा अपना है
मैं आज चली हूँ नयी मंज़िल की तरफ़
आज मेरी आँखों में एक नया सपना है
बीते हुए लम्हों को कैसे भूलेगा कोई
उसमें तो एक अधूरा रिश्ता अपना है
जादू का खेल है महब्बत [...]
Archive for December, 2007
28 Dec
मेरा दर्द मेरा दु:ख मेरा अपना है
28 Dec
धीरे-धीरे उतरती है साँस सीने में
धीरे-धीरे उतरती है साँस सीने में
यह दर्द बड़ा बेदर्द है सीने में
लुत्फ़ जीने क सब ख़त्म हो गया
डूबती दिखती है हर आस सीने में
उसने सवाल यूँ रखे मेरे सामने
जवाब आबला-पा रह गये सीने में
एक कशिश जो उसकी आँखों में थी
वबा बनके रहती है आज सीने में
शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००३
28 Dec
बेवफ़ा कहकर तुझको कोई इल्ज़ाम न दूँगा
बेवफ़ा कहकर तुझको कोई इल्ज़ाम न दूँगा
अपनी पाकीज़ा मोहब्बत को दुश्नाम न दूँगा
उन सिलसिलों की ख़ुशबू आज भी आँखों में रची है
इस रंगे-हिना को अश्कों का अन्जाम न दूँगा
तेरे हुस्न की बर्क़ ने मारा है दीवाना करके
तेरा ग़ुलाम हूँ किसी के हुज़ूर में सलाम न दूँगा
तू हर्फ़े-मुक़र्रर है मेरी तक़दीर में जानाँ
मैं किसी भी ग़ैर [...]
28 Dec
तुमको न पाया तो खोया भी कुछ नहीं
तुमको न पाया तो खोया भी कुछ नहीं
पत्थर है दिल मेरा नहीं सच नहीं
मुझको यक़ीं ख़ुद पे नहीं है सनम
दूर रहके तू मुझसे नहीं ख़ुश नहीं
खोया होता जब मैंने तुझे पाया होता
खोने-पाने पर किसी का कोई वश नहीं
जो इश्क़ बचा हो आइनें में ज़रा भी
हम साथ होंगे दिन वह भी दूर नहीं
ख़फ़ा रहे तू मेरी [...]
28 Dec
आज वह हर शख़्स मुझे बेग़ाना लगता है
आज वह हर शख़्स मुझे बेग़ाना लगता है
कल तक जिसके लिए दिल दिवाना लगता है
निगाहों में हैं सारे अंदाज़ आज भी वही
मगर ख़ामोशी में नया अफ़साना लगता है
हो मशरूफ़ वह अपने कामों में क्या पता
बड़ा ख़राब उसका नज़रें चुराना लगता है
न कुछ कहता है वह न कुछ करता है
दूर-दूर रहता है मुझसे रोज़ाना लगता है
वह [...]




















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