मेरा दर्द मेरा दु:ख मेरा अपना है
बाक़ी सब झूठ है यह सच्चा सपना है
कल तक लबों पर उसके लिए दुआ थी
आज दुआ में थोड़ा कुछ हिस्सा अपना है
मैं आज चली हूँ नयी मंज़िल की तरफ़
आज मेरी आँखों में एक नया सपना है
बीते हुए लम्हों को कैसे भूलेगा कोई
उसमें तो एक अधूरा रिश्ता अपना है
जादू का खेल है महब्बत कैसे बचते
क्या करें अब यह टूटा हुआ सपना है
शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००३
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धीरे-धीरे उतरती है साँस सीने में
यह दर्द बड़ा बेदर्द है सीने में
लुत्फ़ जीने क सब ख़त्म हो गया
डूबती दिखती है हर आस सीने में
उसने सवाल यूँ रखे मेरे सामने
जवाब आबला-पा रह गये सीने में
एक कशिश जो उसकी आँखों में थी
वबा बनके रहती है आज सीने में
शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००३
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बेवफ़ा कहकर तुझको कोई इल्ज़ाम न दूँगा
अपनी पाकीज़ा मोहब्बत को दुश्नाम न दूँगा
उन सिलसिलों की ख़ुशबू आज भी आँखों में रची है
इस रंगे-हिना को अश्कों का अन्जाम न दूँगा
तेरे हुस्न की बर्क़ ने मारा है दीवाना करके
तेरा ग़ुलाम हूँ किसी के हुज़ूर में सलाम न दूँगा
तू हर्फ़े-मुक़र्रर है मेरी तक़दीर में जानाँ
मैं किसी भी ग़ैर को अपने दिल में मुक़ाम न दूँगा
शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००३
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तुमको न पाया तो खोया भी कुछ नहीं
पत्थर है दिल मेरा नहीं सच नहीं
मुझको यक़ीं ख़ुद पे नहीं है सनम
दूर रहके तू मुझसे नहीं ख़ुश नहीं
खोया होता जब मैंने तुझे पाया होता
खोने-पाने पर किसी का कोई वश नहीं
जो इश्क़ बचा हो आइनें में ज़रा भी
हम साथ होंगे दिन वह भी दूर नहीं
ख़फ़ा रहे तू मेरी किसी बात से अब
इस बात में रत्ती भर भी सच नहीं
शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००३
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आज वह हर शख़्स मुझे बेग़ाना लगता है
कल तक जिसके लिए दिल दिवाना लगता है
निगाहों में हैं सारे अंदाज़ आज भी वही
मगर ख़ामोशी में नया अफ़साना लगता है
हो मशरूफ़ वह अपने कामों में क्या पता
बड़ा ख़राब उसका नज़रें चुराना लगता है
न कुछ कहता है वह न कुछ करता है
दूर-दूर रहता है मुझसे रोज़ाना लगता है
वह कल तक सलाम ‘विनय’ को करता था
आज उसको मुश्किल मुस्कुराना लगता है
शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००३
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