तुम न मानो मगर तुम्हें चाहता हूँ

रात-दिन दुआओं में तुम्हें माँगता हूँ
तुम न मानो मगर तुम्हें चाहता हूँ

फूल-ख़ुशबू-बहार’ सब हैं चमन में
मैं सिर्फ़ तुझ को इनमें जानता हूँ

अब तेरा ही सपना है मेरी आँखों में
दिन-रात तेरे ख़्वाब में जागता हूँ

मन में तेरी यादों की नर्म धूप है
ख़्यालों के उजले मैदान में भागता हूँ

तुम मेरी मौत हो या ज़िन्दगी, कुछ हो
मैं तेरे ही नाम की ताबीज़ें बाँधता हूँ

पूछो मेरा हाल तुम कभी उस चाँद से
जिसे सारी रात तेरी याद में ताकता हूँ

तेरी नज़र में मेरी कुछ क़ीमत होगी
मगर मैं अनमोल तुम्हें आँकता हूँ


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००३

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