मैं कम-शक़्ल हूँ

November 30, 2007 at 11:30 pm (मेरी ग़ज़ल) (, , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , )

जिसे चाहता हूँ वो कहता है मुझसे प्यार न कर
दर्द सहना पड़ेगा’ मेरा इन्तज़ार न कर

मेरा दिल धड़कता है तुम्हारा नाम लेता है ज़ोर-ज़ोर
कहता है दीवाने मुझपे तू इख़्तियार न कर

मेरी दुआ में असर आया है एक मुद्दत के बाद
सर्द आह कहती है मुझको शरार न कर

दुनिया का डर कैसा? क्या उसे नहीं मेरा एतबार
बावजूदे-प्यार वह नहीं देखता है मुझे मुड़कर

मैंने क्या ख़ता की ख़ुदाया मुझे किस बात की
उसकी नज़र क्यों झुक जाती है मुझे देखकर

मैं कम-शक़्ल हूँ उसे इस बात की नहीं परवाह
उसको चाहूँगा मैं सारे रस्मो-रिवाज़ तोड़कर



शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००५

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