ख़ुदाया कभी करम मुझ पर भी

November 30, 2007 at 11:29 pm (मेरी ग़ज़ल) (, , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , )

ख़ुदाया कभी करम मुझ पर भी
सुम्बुल की थोड़ी मेहर इधर भी

प्यार क्या है नहीं जानता मैं
मगर सिखा दे मुझे ये हुनर भी

तेरा ख़ाब सजाया मैंने आँखों में
ख़ाब है चाँद है और सहर भी

इश्क़ की आग जो इस दिल में है
एक अक़्स है इसका उधर भी

मोहब्बत का दावा किया जो आज
मैं करूँगा रोज़े-मशहर भी

मेरी जान भी ले लो अगर चाहिए
मगर लेना मेरी कुछ ख़बर भी


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००५

Post a Comment