अब तेरा ही सपना है
रात-दिन दुआओं में तुमको माँगता हूँ
तुम न मानो मगर तुमको चाहता हूँ
फूल ख़ुशबू बहार सब हैं चमन में
सिर्फ़ तेरा रस्ता निहरता हूँ
अब तेरा ही सपना है मेरी आँखों में
जिसके लिए दिन-रात जागता हूँ
मन में तेरी यादों की नर्म धूप है
ख़्यालों के उजले मैदानों में भागता हूँ
तुम मेरी मौत हो या ज़िन्दगी कुछ भी
दोनों के दरम्याँ फ़र्क़ को जानता हूँ
पूछो मेरा हाल तुम उस चाँद से जाकर
तेरी यादों में जिसे सारी रात ताकता हूँ
तेरी नज़रों में मेरी कुछ क़ीमत होगी
मगर मैं तुमको अनमोल आँकता हूँ
शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००५
