ज़िन्दगी से दर्द’ दर्द से ज़िन्दगी मिली है
ज़िन्दगी के वीराने में तन्हाई की धूप खिली है
मैं रेत की तरह बिखरा हुआ हूँ ज़मीन पर
उड़ता जा रहा हूँ उधर’ जिधर की हवा चली है
मैं जानता हूँ उसका चेहरा निक़ाब से ढका है
महज़ परवाने को लुभाने के लिए शम्अ जली है
बदलता है वो रुख़ को चाहो जिसे जान से ज़्यादा
मेरी तो हर सुबह’ दोपहर’ शाम यूँ ही ढली है
आज देखा उसे जिसे कल तक दोस्ती का पास था
आज देखकर उसने मुझे अपनी ज़ुबाँ सीं ली है
किसने पहचाना ‘नज़र’ तुम्हें भूलने के बाद
अब तन्हा जियो तुमको ऐसी ज़िन्दगी भली है
शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००५
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रात-दिन दुआओं में तुमको माँगता हूँ
तुम न मानो मगर तुमको चाहता हूँ
फूल ख़ुशबू बहार सब हैं चमन में
सिर्फ़ तेरा रस्ता निहरता हूँ
अब तेरा ही सपना है मेरी आँखों में
जिसके लिए दिन-रात जागता हूँ
मन में तेरी यादों की नर्म धूप है
ख़्यालों के उजले मैदानों में भागता हूँ
तुम मेरी मौत हो या ज़िन्दगी कुछ भी
दोनों के दरम्याँ फ़र्क़ को जानता हूँ
पूछो मेरा हाल तुम उस चाँद से जाकर
तेरी यादों में जिसे सारी रात ताकता हूँ
तेरी नज़रों में मेरी कुछ क़ीमत होगी
मगर मैं तुमको अनमोल आँकता हूँ
शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००५
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तुमको ज़िन्दगी की हर ख़ुशी मिले
तेरे लबों को मीठी-मीठी हँसी मिले
हर दिन तुम्हें बहार का दिन हो
न तेरी आँखों को कभी नमी मिले
तुम जो हो जैसी हो सबसे अच्छी हो
तुमको सबसे सच्ची दोस्ती मिले
फूल का खिलना है तुम्हारा हँसना
तुम्हें सदा सहर की ताज़गी मिले
शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००५
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ख़स्ताहाल है जो तेरा बीमार
क्यों नहीं हो तुम बेक़रार
तुमने मुझसे बात नहीं की
जला गयी मुझे आहे-शोलाबार
शामे-ग़म मुझे दर्द थे
और तुम आये गोया बहार
पैराहन भीग जाता है लहू से
यूँ बहते हैं दीदाए-फ़िगार
देखना’ न छूना मेरे ज़ख़्म
जला न दे तुझे यह शरार
दाइम मशगूले-हक़ हूँ मैं
फिर भी आश्ना है अग़ियार
कोई हसरत से देखे मुझे
मैं उसे बना लूँ अपना प्यार
तुमसे दोस्ती का बहाना मिले
बन जाओ मेरे ग़मख़्वार
ख़ाब में लम्स था सुम्बुल का
वो क्या लम्हा था यादगार
‘नज़र’ को न भाये कुछ अगर
तो दिल में हो तुम बरक़रार
ख़स्ताहाल= abandon, बीमार= ill, बेक़रार= curious, आह= ah!, woe, शोला= fire, spark, गोया= like that, पैराहन= cloth, लहू= blood, दीदा= eyes, फ़िगार= afflicted, sore, ज़ख़्म= scar, wound, शरार= fire, spark, दाइम= always, मशगूल= busy, हक़= truth, आश्ना= friend, अग़ियार= enemy, ग़मख़्वार= who share sorrow, लम्स= touch, सुम्बुल= sumbul
शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००५
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इल्तिहाबे-दर्द से जलता है कलेजा
कभी तेरी यादों को बिखराया कभी सहेजा
बयाँ दास्ताने-सोज़े-फ़ुगाँ किससे करूँ
सभी मेरे लफ़्ज़ देखते हैं न कि लहजा
सुकूनो-क़रारो-सबात से क्या मुझे
तू इस दिल के सौदे में मेरा सब कुछ ले जा
सदाए-राहे-मुहब्बत बुलाती है मुझको
दिमाग़ कुछ सोच के कहता है ठहर जा
गर्मिए-हौसले-जुनूँ का असर है यह
दिल करता है मुझपे नवाज़िशहाए-बेजा
अब तक न मेरे सलाम का कोई जवाब आया
तूने मुझको कोई ख़त भेजा कि न भेजा
ख़्याले-सुम्बुल से बीमार की बेक़रारी है
ऐ तबीब ‘नज़र’ को इसका इलाज दे जा
शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००५
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