Archive for November, 2007

किसने पहचाना ‘नज़र’ तुम्हें भूलने के बाद

ज़िन्दगी से दर्द’ दर्द से ज़िन्दगी मिली है
ज़िन्दगी के वीराने में तन्हाई की धूप खिली है
मैं रेत की तरह बिखरा हुआ हूँ ज़मीन पर
उड़ता जा रहा हूँ उधर’ जिधर की हवा चली है
मैं जानता हूँ उसका चेहरा निक़ाब से ढका है
महज़ परवाने को लुभाने के लिए शम्अ जली है
बदलता है वो रुख़ को चाहो जिसे [...]

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तुम न मानो मगर तुम्हें चाहता हूँ

रात-दिन दुआओं में तुम्हें माँगता हूँ
तुम न मानो मगर तुम्हें चाहता हूँ
फूल-ख़ुशबू-बहार’ सब हैं चमन में
मैं सिर्फ़ तुझ को इनमें जानता हूँ
अब तेरा ही सपना है मेरी आँखों में
दिन-रात तेरे ख़्वाब में जागता हूँ
मन में तेरी यादों की नर्म धूप है
ख़्यालों के उजले मैदान में भागता हूँ
तुम मेरी मौत हो या ज़िन्दगी, कुछ हो
मैं तेरे [...]

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तुमको सबसे सच्ची दोस्ती मिले

तुमको ज़िन्दगी की हर ख़ुशी मिले
तेरे लबों को मीठी-मीठी हँसी मिले
हर दिन तुम्हें बहार का दिन हो
कभी न तेरी आँखों को नमी मिले
तुम जो हो जैसी हो सबसे अच्छी हो
तुमको सबसे सच्ची दोस्ती मिले
फूल का खिलना है तुम्हारा हँसना
तुम्हें सदा सहर की ताज़गी मिले
शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००५

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ख़ाब में लम्स था सुम्बुल का

ख़स्ताहाल है जो तेरा बीमार
क्यों नहीं हो तुम बेक़रार
तुमने मुझसे बात नहीं की
जला गयी मुझे आहे-शोलाबार
शामे-ग़म मुझे दर्द थे
और तुम आये गोया बहार
पैराहन भीग जाता है लहू से
यूँ बहते हैं दीदाए-फ़िगार
देखना’ न छूना मेरे ज़ख़्म
जला न दे तुझे यह शरार
दाइम मशगूले-हक़ हूँ मैं
फिर भी आश्ना है अग़ियार
कोई हसरत से देखे मुझे
मैं उसे बना लूँ अपना [...]

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इल्तिहाबे-दर्द से जलता है कलेजा

इल्तिहाबे-दर्द से जलता है कलेजा
कभी तेरी यादों को बिखराया कभी सहेजा
बयाँ दास्ताने-सोज़े-फ़ुगाँ किससे करूँ
सभी मेरे लफ़्ज़ देखते हैं न कि लहजा
सुकूनो-क़रारो-सबात से क्या मुझे
तू इस दिल के सौदे में मेरा सब कुछ ले जा
सदाए-राहे-मुहब्बत बुलाती है मुझको
दिमाग़ कुछ सोच के कहता है ठहर जा
गर्मिए-हौसले-जुनूँ का असर है यह
दिल करता है मुझपे नवाज़िशहाए-बेजा
अब तक न मेरे [...]

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