हमने अबस की आरज़ू छोड़ दी

September 20, 2007 at 6:34 am (मेरी ग़ज़ल) (, , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , )

हमने अबस की आरज़ू छोड़ दी
तुमको पाने की जुस्तजू छोड़ दी

चाक़ जिगर को गरेबाँ में छिपाके
हमने हसरते-रफ़ू छोड़ दी

बुलाता रहा माज़ी पलट-पलट के
मगर अब इश्क़ की खू़ छोड़ दी

मैं हूँ अधूरी खा़हिशों का मुब्तिला
ग़ालिबन हमने वो बाज़ू छोड़ दी

है आज मौसम बदला-बदला
वो गुफ़्तार वो गुफ़्तगू छोड़ दी

हर  जगह पाओगे तुम मुझको
मैंने मेरी नज़र चार-सू छोड़ दी


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: ३१ जुलाई २००४

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