हम जो उनके ज़ानूँ पर

September 20, 2007 at 6:23 am (मेरी ग़ज़ल) (, , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , )

हम जो उनके ज़ानूँ पर अपना जिगर रखते हैं
तो वह देखकर मेरे ज़ख़्मे-जिगर हँसते हैं

बड़ी बद्-ग़ुमानियाँ हैं हमसे ग़ैरों की तरह
देखते हैं कि कब तलक दिल पे ज़बर रखते हैं

हैं शबो-रोज़ उनके ख़्याल उनसे फ़िराक़
और वो हैं कि न इक इनायते-नज़र रखते हैं

दिल में उनके हम भी अपना नाम लिख देंगे
कि अपनी आहो-फ़ुगाँ में हम वो असर रखते हैं

हुई है इस क़दर हमें उनसे मुहब्बत
कि उनका नाम हम दिल की दीवार पर लिखते हैं

‘नज़र’ न पूछो हाले-दिल मोहब्बत में मेरा
बहुत बेक़रार हम अपना जिगर रखते हैं

ज़ानूँ= Knee


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २६ जुलाई २००४

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