Archive for September 20th, 2007

दर्द की तहरीरें

मैं जो तुम्हें देखता हूँ मुझको देखती हैं तेरी तस्वीरें
साँस लेता हूँ मगर कमनसीब हैं हाथों की लक़ीरें
न ही कोई रब्त न ही रिश्ता न मरासिम न बंधन
फिर मेरे मन में पड़ रही हैं किसकी तसलीम की ज़ंजीरें
पाँव मोड़ दर मोड़ चलके इस मोड़ तक आये थे
शायद इसीलिए नाकाम हैं खा़हिशों की सारी तदबीरें
जबींसाई से [...]

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दिल में तेरे लिए सच्ची अक़ीदत है

है जो किसी से तुम्हें तो गुल से निस्बत है
तुम मुझको मिले हो यह मेरी क़िस्मत है
तेरे तब्बसुम से ही है यह रंगे-बहार
लगता है अब जैसे सारी फ़िज़ा जन्नत है
तेरी आँखों की गुलाबी डोरियाँ जैसे नश्शा-ए-मै
तिश्ना-लब हूँ मुझे पीने की हसरत है
तेरी ज़ुल्फ़ों से गुज़रते देखी है मैंने सबा
हाए! यह सबा भी कितनी खु़श-क़िस्मत है
तेरे [...]

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तेरे चेहरे पर अपनी नज़र ढूँढ़ते हैं

हर गली हर कूचा दर-ब-दर ढूँढ़ते हैं
हम अपनी दुआ में असर ढूँढ़ते हैं
तुम देखकर हँसते हो मुझे और हम
तेरे चेहरे पर अपनी नज़र ढूँढ़ते हैं
कौन दूसरा होगा हम-सा सितम-परस्त
हम अपना-सा कोई जिगर ढूँढ़ते हैं
जो राह मंज़िल तक पँहुचती होगी
तेरी चाहत में ऐसी रहगुज़र ढूँढ़ते हैं
धूप छुप गयी है कोहरे से भरी वादियों में
और हम हैं [...]

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हमने अबस की आरज़ू छोड़ दी

हमने अबस की आरज़ू छोड़ दी
तुमको पाने की जुस्तजू छोड़ दी
चाक़ जिगर को गरेबाँ में छिपाके
हमने हसरते-रफ़ू छोड़ दी
बुलाता रहा माज़ी पलट-पलट के
मगर अब इश्क़ की खू़ छोड़ दी
मैं हूँ अधूरी खा़हिशों का मुब्तिला
ग़ालिबन हमने वो बाज़ू छोड़ दी
है आज मौसम बदला-बदला
वो गुफ़्तार वो गुफ़्तगू छोड़ दी
हर  जगह पाओगे तुम मुझको
मैंने मेरी नज़र चार-सू छोड़ [...]

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माज़ी को बहुत खंघालते हैं लोग

माज़ी को बहुत खंघालते हैं लोग
बेतरह मतलब निकालते हैं लोग
हुआ कब मुझ से उनका बुरा
किसलिए नाम मेरा उछालते हैं लोग
ग़लतफ़हमियों की आदत है उन्हें
ग़लतफ़हमियाँ पालते हैं लोग
अपनी पे जब बन आयी है तो देखा है
किस तरह मुझे टालते हैं लोग
मुझे जो देखते हैं गिरता हुआ कहीं
दिखावे के लिए सँभालते हैं लोग
किस तरह यारब समझाऊँ इन्हें
मेरे [...]

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