वह हर्फ़ आज भी अटका हुआ है

ज़हन के बियाबाँ में
किसी शज़र की शाख़ पर देखो,
किसी अधूरी नज़्म का
कोई हर्फ़ अटक गया है

मेरा ख़्याल उसे
उतारने तो गया था मगर
उसने चीखकर कहा था
‘लौट जाओ’
ख़्याल बेचारा डरा-सा सहमा-सा
लौट आया था

वह हर्फ़ आज भी अटका हुआ है
एक ख़ामोशी के साथ
किसी सन्नाटे की तरह
मैं चाहकर भी उसको
अपनी कापी पे उतार नहीं सकता
कितना नाचार हूँ मैं, कितना बेबस…

शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००३

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