वह दिवाली की शाम थी

वह दिवाली की शाम थी
तुम अपने घर की चौखट पे
पूजा के दिये रख रही थी

लिबास शामीन था तुम्हारा
सितारों वाली गहरी शफ़क़ की तरह
बिल्कुल यूँ लग रहा था मानो
गहरी शफ़क़ आस्माँ पर चाँद खिला हो

अगर उस रोज़ उस शाम
तुम्हें बद्र देख लेता तो
वह भी तुम्हें देखता ही रहता

तुम्हारा वह हुस्न
आज भी मेरी आँखों में वैसे का वैसा है
अब तो हर रोज़ हर शाम
हर चाँद धुँधला ही लगता है मुझे!

शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००३

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