मिलने का ये सिलसिला…

कभी तू आये ख़ाब में मेरे
हाथ पकड़ के ये कहूँ मैं
‘मिलने का ये सिलसिला
यूँ ही ज़ारी रखना,
मुझे तुमसे मुहब्बत है’

चाँद सुलग रहा है
बर्फ़ हो जायेगा सुबह तक
तुम अपने लबों से छूकर
इसे पानी कर देना
बह जायेगा…

मेरी पलकों के सितारे
लबों से चूम लो, हाथों में पहन लो
बेशक़ीमती न सही
लेकिन मेरे प्यार की निशानी हैं..

शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००३

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