नासमझी की बात करते हो

है भला कौन जीत सका ‘नज़र’ से हमसे लड़ोगे
नासमझी की बात करते हो

है मोहरा एक पिटा, हमारी मात समझते हो इसे
नासमझी की बात करते हो

लब सीं लिये, कहर हमपे ढहोगे, क्या बात है!
नासमझी की बात करते हो

हैं सफ़ा-सफ़ा आइनें की दरारें, क्या अक्स देखोगे?
नासमझी की बात करते हो

शमशीरे-’नज़र’ को दीवाना करके लड़ोगे, ख़ूब!
नासमझी की बात करते हो

शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००३

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