कोई दिलसिताँ नहीं आता

कोई दिलसिताँ नहीं आता इन पर,
तन्हा पड़ी हैं यह सड़कें
लाखों पाँव के निशाँ के बीच

बस अजनबी से चेहरे गुज़रते हैं रोज़
और मैं चेहरों में
एक ही शक़्ल ढूँढ़ता हूँ, तुम्हारी शक़्ल

कभी तेरे पाँव के निशाँ मिलें
तो मैं अपने घर तुमको बुलाऊँ,
‘एक बार दरवाज़े तक तो आये थे तुम’

यह सड़कें कब तक भीगेगीं, सूखेगीं
आँखों की तरह,
बस टूट-टूटकर कोसों तक…
वीरान धरातल में समाविष्ट हो जायेंगी

शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००३

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