शाम हुई
एक उदासी परछाईं की तरह
जिस्म के पीछे-पीछे चलने लगी
और एक बूँद
कोरे किनारों को तर कर गयी
ज़हन जैसे लिहाफ़ है फटा हुआ
और किसी ने उस पर
ख़्यालों के पैबंद सीं दिये हैं
इसको न ओढूँ तो
सर्द रातें बेकस कर जायें
रात तो किसी तरह कट ही गयी
ज्यों शगाफ़ ने करवट ली
सहर ने उफ़क़ के किनारे तेज़ कर दिये
फिर [...]
Archive for September 18th, 2007
18 Sep
एक उदासी परछाईं की तरह
18 Sep
वह हर्फ़ आज भी अटका हुआ है
ज़हन के बियाबाँ में
किसी शज़र की शाख़ पर देखो,
किसी अधूरी नज़्म का
कोई हर्फ़ अटक गया है
मेरा ख़्याल उसे
उतारने तो गया था मगर
उसने चीखकर कहा था
‘लौट जाओ’
ख़्याल बेचारा डरा-सा सहमा-सा
लौट आया था
वह हर्फ़ आज भी अटका हुआ है
एक ख़ामोशी के साथ
किसी सन्नाटे की तरह
मैं चाहकर भी उसको
अपनी कापी पे उतार नहीं सकता
कितना नाचार हूँ मैं, कितना [...]
18 Sep
वह दिवाली की शाम थी
वह दिवाली की शाम थी
तुम अपने घर की चौखट पे
पूजा के दिये रख रही थी
लिबास शामीन था तुम्हारा
सितारों वाली गहरी शफ़क़ की तरह
बिल्कुल यूँ लग रहा था मानो
गहरी शफ़क़ आस्माँ पर चाँद खिला हो
अगर उस रोज़ उस शाम
तुम्हें बद्र देख लेता तो
वह भी तुम्हें देखता ही रहता
तुम्हारा वह हुस्न
आज भी मेरी आँखों में वैसे का [...]
18 Sep
नासमझी की बात करते हो
है भला कौन जीत सका ‘नज़र’ से हमसे लड़ोगे
नासमझी की बात करते हो
है मोहरा एक पिटा, हमारी मात समझते हो इसे
नासमझी की बात करते हो
लब सीं लिये, कहर हमपे ढहोगे, क्या बात है!
नासमझी की बात करते हो
हैं सफ़ा-सफ़ा आइनें की दरारें, क्या अक्स देखोगे?
नासमझी की बात करते हो
शमशीरे-’नज़र’ को दीवाना करके लड़ोगे, ख़ूब!
नासमझी की बात [...]
18 Sep
वो मेरे मायने ही बदल देते हैं
लफ़्ज़ मेरे
किसी सादे काग़ज़ की तरह हैं
जिनको कोई पढ़ता नहीं,
लोग बस इन पर
कुछ लिखने की कोशिश करते हैं
वह लिखते रहते हैं
मैं मिटाता रहता हूँ
क्योंकि वो मेरे मायने ही बदल देते हैं
कोई मुझको आज तक
एक ऐसा नहीं मिला,
जिसने पढ़ा हो मेरे लफ़्ज़ों को
बिन किसी फेर बदल के
और कहा हो,
‘इतना दर्द किससे मिला है आपको
क्या आप मुझसे [...]




















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