ज़िन्दगी अजब मोड़ पर आकर

ज़िन्दगी अजब मोड़ पर आकर
थम-सी गयी है
रुक-सी गयी है
सुबह आह में, दोपहर आँसुओं में
शाम सिसकियों में और
रात फ़ुगाँ में बह रही है…

एक तन्हाई, एक ख़ामोशी
परछाईं की तरह मीलों से
मेरे पीछे-पीछे चल रही है
और मैं रोज़ फ़रहतो-शाद से
इक अजनबी की तरह मिलता हूँ…

कितना गुदगुदाते हैं दोनों
और गले भी मिलते हैं मुझसे
मगर हँसी है कि
लबों से फूटती ही नहीं
यूँ लगता है मानो, गुलाब है कोई
बरसों से किताब के बीच
दबा हुआ, मुरझाया हुआ
यादों की ओस में बिल्कुल सूखा हुआ,
खु़श्क…

उदासी का सैलाब वक़्त के दरिया में
चढ़ता ही जा रहा है…
चढ़ता ही जा रहा है…

शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००४

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