अनछुआ-सा इक दिन

अनछुआ-सा इक दिन गुज़र गया
अनछुई-सी एक रात बिखर गयी
मैंने दरवाज़ा खोला
तो सूरज की राख़ पड़ी थी
और चाँद की आह सिसक रही थी

मुठ्ठियों में भर ली राख़
और आह का लहू पोंछा
और समझाया कि
ज़िन्दगी का मानी और हासिल एक ही होता है
जैसे सिक्के के टॉस के बाद
उसका एक ही पहलू चुनते हैं

ठीक इसी तरह से ज़िन्दगी का
कोई न कोई पहलू
अनछुआ रह जाता है
और इक हैफ़,
यह ज़हर हर लम्हा लहू में घोलता रहता है

और इस लत की ज़मीन में हम
धँसते जाते हैं, धँसते जाते हैं
वह भी एक उम्मीद पर…

शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००४

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