Archive for September 17th, 2007

बुराई

मेरे ज़हन से बुरा
और क्या होगा
शायद मेरे दिल का
कोई कोना होगा
जब से जिगर में
उसका नक्शे-पा है
वही मेरा दैरो-हरम
मक्का-मदीना है
बुराई सब ख़त्म हो गयी है…
 
शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००३

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यह तन्हा सफ़र

ये बादलों के घट
रिस रहे हैं
भीग रही है हर पत्ती
हर डाली
और
फूल भी भीग रहे हैं
तेरी यादों से
एक उदासी भी
बरस रही है
कुछ ऐसे ही,
कभी तुम
महसूस करके देखना
ख़ुद को तनहा
लगने लगोगी…
मैं आज भी
नज़रें बिछाके
बैठा हूँ तेरी राह में,
आ,
कि मुझे कहीं
अपने साथ ले चल
यह तन्हा सफ़र
और गँवारा नहीं मुझे…
 
शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००३

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काग़ज़

क़तरे हुए
कुछ लफ़्ज़
अटके हुए हैं
ज़बाँ के
इक ख़ार से
उतरेंगे
जब भी किसी
काग़ज़ पर
लहू लुहान
ही उतरेंगे
और जब
ताज़ा लहू
सूखेगा
कुछ काले चकते
रह जायेंगे,
सहमे हुए
काग़ज़ पर
डरा हुआ काग़ज़
चीखेगा भी तो क्या?
सिर्फ़ -
ख़ामोशी ही ना!
 
शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००३

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दुश्मनी

हमने
बड़े हौसले से
यह दीवारें
खड़ी की हैं
दुश्मनी
नाम है इनका
अब यह
दीवारें न गिराना
वर्ना कुछ यादें
रह जायेंगी
तोड़कर
जोड़े गये
तागे में
गिरह की तरह…
 
शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००३

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तेरी उंगलियाँ पकड़कर ही

ग़मज़दा, सहमी हुई
रात के हाथों में
मेंहदी सजायी मैंने,
चाँद की मेंहदी…
सिसकता हुआ दिन
कब से आँधियों की गर्द में
भटका हुआ था,
तेरी उंगलियाँ पकड़कर ही
यह घर वापस लौटा है,
ख़ुशरंग शाम के वक़्त…
ख़ुद मैंने ही
न छूकर देखा था कभी
दिल का शीशा
पहले से चिटका हुआ था…
तुमसे जो ग़म मिला है मुझको
ज़िन्दगी मानो शहद हो गयी है
 
शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: [...]

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