अपना-सा यहाँ कोई होता

तुम गये हो इस तरह से
कि मुझे यक़ीन नहीं होता
चाहता हूँ एक मेरा भी
अपना-सा यहाँ कोई होता

मेरा दिल हर लम्हा
तुझे याद करता है
हर एक लम्हा, बीता लम्हा
तोड़ने की कोशिश करता है

अब जानने लगा हूँ कि
तेरा मिलना मुमकिन नहीं
(इक पल को ऐसा लगता था)
तुम रहो सदा सलामत
यही रब से दुआ करता हूँ

शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २०००

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