ये जो कोरा काग़ज़ है
मेरी ज़िन्दगी-सा है
कभी इस किताब में
कभी तेरे खा़ब में
दिखायी देता है…
जिस तरह से
लिख दे कोई इस पर
जिस तरह से
रंग दे कोई साँझ-सवेर
ऐसे ही मिलता है हमें
ज़िन्दगी से फीका ज़हर
हवाओं में खु़शबुएँ
साँसों में ज़िन्दगी
घुल जायेगी
कहीं न कहीं हमें
वो हसीन ज़िन्दगी
मिल जायेगी
बीते लम्हे,
इंतज़ार का ये पल
कोई लिखता नहीं
ढूँढ़ता हूँ जिस
आइनें में खु़द को
मैं [...]
Archive for September 16th, 2007
16 Sep
ये जो कोरा काग़ज़ है
16 Sep
गुलाबी बादलों के साये
गुलाबी बादलों
के साये
चाँद पर हैं
छाये हुए
हल्की मध्दम
रोशनी
जो दिख रही है
नाम तेरा
मेरे जिस्म पर
लिख रही है
मेरी तक़दीर में
बस एक तू है
मेरी सारी उम्र
का हासिल
बस एक तू है
जिस ख़ाब को
छूना चाहता हूँ
उसकी पहली तस्वीर
बस एक तू है
मेरे दिल की चाँदनी
साँसों की डोर
बस एक तू है
शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २०००
16 Sep
अपना-सा यहाँ कोई होता
तुम गये हो इस तरह से
कि मुझे यक़ीन नहीं होता
चाहता हूँ एक मेरा भी
अपना-सा यहाँ कोई होता
मेरा दिल हर लम्हा
तुझे याद करता है
हर एक लम्हा, बीता लम्हा
तोड़ने की कोशिश करता है
अब जानने लगा हूँ कि
तेरा मिलना मुमकिन नहीं
(इक पल को ऐसा लगता था)
तुम रहो सदा सलामत
यही रब से दुआ करता हूँ
शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: [...]
16 Sep
एक मौसम
एक मौसम
जो खु़शबू लाया था
एक वह
जो कभी आया था
ज़्यादा नहीं
ज़रा-सा ग़म दे गया है
टूटा नहीं
शायद ख़ाब बिखर गया है
शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २०००
16 Sep
रात धुल गयी
रात धुल गयी
दिन चमक गया
साँस बजती रही
बस,
दिन गुज़र गया
शाम आयी
तन्हा-तन्हा
मील गिनके
चाँद के साथ
अंजान होकर गयी
रातों के चलते रहे
सिलसिले
आज फिर वही
रात आ गयी
वक़्त के फ़ासले
हासिल देते रहे
तेरी कोई आहट
कोई ख़बर न आयी
बुझे-बुझे अश्क़
आँख छू गये
आयी रात हरजाई
मेरा ख़ाब ले गयी
शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २०००




















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