‘विनय’ हूँ मैं

मैं वो आग हूँ
जो लग जाऊँ तो
जंगल का तिनका-तिनका जला दूँ

फैल जाऊँ चंद लम्हों में
कुछ इस तरह
जैसे आग के बवण्डर
आग के तूफ़ाँ…

मैं हूँ विनय,
‘विनय’ हूँ मैं
एक मेरे सिवा यहाँ कोई कुछ नहीं


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: ११/अप्रैल/२००३

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