शाम गहरी हो रही थी

शाम गहरी हो रही थी
सुनहरा चाँद
बादलों से झाँक रहा था
छत पे था मैं
और पुरवाई बह रही थी
तेरा ख़्याल और मैं
और मेरी तन्हाई थी

मौसम भी आ गया था
बादल भी आ गये थे
जो नहीं आयी
वो थी तू और बारिश
मकानों की खिड़कियों से
रोशनी झाँकने लगी थी
और शाम ढल गयी थी


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००२

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