नज़र

September 15, 2007 at 8:53 pm (मेरी नज़्म) (, , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , )

‘नज़र’ वो नज़र
जो लग जाये तो तबाह कर  दे
अपनी पे आये तो
हर इक अदू को बरबाद कर दे
उसका तैशो-जुनूँ
पागलपन की हद है
वह अपनी से गुज़र जाये तो
हर गुनाह कर दे
उसके नाम के साथ
जो भी जफ़ा करेगा हरजाई
उसको वह बीच भँवर
अपनी के लिए बेसफ़ीना कर दे


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००३

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