इक मौक़ा दो तुम मुझे

September 15, 2007 at 9:36 am (मेरी नज़्म) (, , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , )

इक मौक़ा दो तुम मुझे
कि बता सकूँ
कितना टूटकर प्यार करता हूँ तुमसे

तुम्हें जो चाहिए
सब दूँगा मैं
प्यार, दिल, जाँ, दौलत सब कुछ
शैदाई हूँ तुम्हारे पीछे
जान दे भी सकता हूँ
और ले भी सकता हूँ

तुम मेरी मोहब्बत ही नहीं
मेरी प्रार्थना भी हो
दुआ में हर बार
तुम्हें ही माँगा है मैंने
सच्चे दिल से…

जब चाहो आज़मा लो मुझे
मैं भँवरा नहीं
जो कली-कली मण्डलाता फिरूँ
तुमसे प्यार करता हूँ
कहके देखो सीना चीर दूँगा


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००४ 

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