और इक आह की ख़लिश देती है

रूह बहुत बेक़रार’ बहुत बेकल है
इस जिस्म से छुटकारा चाहती है
अगर तुम न मिली मुझको…
यह बेक़रारी’ यह बेकली उसी दिन से है
जब तुम्हें पहली बार देखा था…

वह अपलक आँखें
वह थमी हुई साँसें
और वह रवाँ धड़कनों की आवाज़…
सारे एहसास,
तुम्हारे तस्व्वुर से आज भी जाग उठते हैं…

तुम्हारी मोहब्बत मुझे हर दम साँस देती है
और इक आह की ख़लिश देती है
हर लम्हा… हर पल…
मैं कब तक यूँ ही ज़ीस्त की गिरह में फँसा रहूँगा!

मेरा हाथ थाम लो,
हमसफ़र बनके अपना लो मुझे
या फिर अपने ही पाक़ीज़ा हाथों से…
दफ़्न कर दो मुझे,
एक यही चाह मुझे बरसों से है

एक यही चाह मुझे बरसों से है…


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००४

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