‘नज़र’ वो नज़र
जो लग जाये तो तबाह कर दे
अपनी पे आये तो
हर इक अदू को बरबाद कर दे
उसका तैशो-जुनूँ
पागलपन की हद है
वह अपनी से गुज़र जाये तो
हर गुनाह कर दे
उसके नाम के साथ
जो भी जफ़ा करेगा हरजाई
उसको वह बीच भँवर
अपनी के लिए बेसफ़ीना कर दे
शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००३
Archive for September 15th, 2007
15 Sep
नज़र
15 Sep
दोस्त, माफ़ कर देना मुझे
तुमने पुकारा था जब
मैंने सुना तो था
मगर मेरा ग़ुरूर
मेरे ज़हन पे यूँ चढ़के बैठा था
कि मैंने देखा भी न तेरे जानिब
जाने किस मशक्कत में
रहा होगा तेरा दिमाग़
जाने तुमने क्या-क्या न सोचा होगा
दुबारा जब तुमने
निगाह चुराके देखा था
उस वक़्त भी तो मैं
ग़ुरूर को आगोश में लिए गुज़रा था
वक़्त की नब्ज़ तो
बहुत भारी लग रही थी
उस पहर [...]
15 Sep
तख़लीक़ हुआ है [ver. 2.0]
मेरे ही हाथों में टूटा है दम मेरा
तेरे ही स्पर्श से तख़लीक़ हुआ है
यह ‘विनय’…
नया जन्म हुआ है तो
नये अहसास भी होंगे
अभी-अभी मेरी मुट्ठी में
जन्मी है यह क़िस्मत
खुलेगी जो कई और कई
जीतों के जश्न भी होंगे
जिससे मेरी हर सोच जुड़ी है
सिर्फ़ एक तुम हो!
मेरी इब्तिदा मेरे ये जश्न
सब तुम्हीं से तो हैं…
शायिर: विनय प्रजापति [...]
15 Sep
तेरे चेहरे ने शिकन लफ़्ज़ों में बयाँ की होगी
तेरे चेहरे ने शिकन लफ़्ज़ों में बयाँ की होगी
कोई यूँ ही तो ख़ुद इतना फ़ुर्त नहीं होता है
लम्हा-लम्हा ख़ला-सी आँखों में क्या बदलता है?
कोई चेहरा आता है आँखों में आकर फिसलता है
बड़ा अजनबी जाना हमको जो सामान लौटा रहे हो
क्या रु-ब-रू होने वालों से कोई अजनबी होता है
मुतमइन-सा हूँ खु़द से, तेरा भी कसूर क्या [...]
15 Sep
शामे-दीपावली
एक बार देखा था तुझे
हाथों में चिराग़ लिए
चौखट पर खड़ी थी
चाँद की निगाहें
तुझ पर टिकी थीं
सारी ज़मीं
नवेली दुल्हन की तरह सजी थी
कानों में पटाखों का शोर
और आँखों में मेहताब की
रंगीन रोशनियाँ थीं
कुछ शामीन से
लिबास में थी तू
और मैं तेरे ही जानिब
देखे जा रहा था
शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००२




















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