ज़िन्दगी से सौ ग़म एक खु़शी मिलती है
अब तक जितनी राहों से गुज़रा हूँ,
ग़म उठाता रहा हूँ…
रूह छिलती रही है मेरी…
सीने की तह में…
जाने कितने ही ज़ख़्मों के टूटे शीशे और
घावों के जंग खाये हुए लोहे के टुकड़े जमा हैं
ज़रा दम भर को करवट लेता हूँ तो…
जोंक की तरह से सारे सबातो-सुकूँ चूसने लगते हैं
पलकें [...]
Archive for September 14th, 2007
14 Sep
जब तक कोई आस उसे आकर पोंछ न दे…
14 Sep
उल्टे सूरज की आग जम गयी
सोचा था दिन चढ़ेगा दोपहर तक
तो सूरज की आग
सर्दियों के सर्द बादलों को ग़ुबार कर देगी
बहने लगेगा बदन में जमा हुआ लहू
और झपकने लगेंगी एक टुक अपलक पलकें
लेकिन ऐसा कुछ भी हुआ नहीं
दिन दोपहर तो चढ़ा पर बादल नहीं छटे
कोहरा नहीं पिघला
उल्टे सूरज की आग जम गयी,
ठिठुर गयी…
सर्द हवा ने बुझा दिया दिन का सूरज
उतरने [...]
14 Sep
एक यही इल्तिजा है…
तुम्हें महसूस हो कि ना हो
मेरे सीने में दर्द है तो सही…
लम्हा-लम्हा जज़्बात पिघलते हैं ग़म की चिंगारियों में,
एहसास उबलते हैं मेरे,
ख़्याल मसलते हैं मुझे…
इक भँवर है आँखों में माज़ी का
मुझको पूरे ज़ोर से खींचता है अपने अंदर…
दिन-दिन, रात-रात, लम्हा-लम्हा, पल-पल
मैं हूँ कि डूबना ही चाहता हूँ
बचने की कोशिश भी नहीं करता
अब तो हाल मेरा [...]




















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