ऐसा पहले तो मैंने नही देखा उसे…

September 22, 2007 at 1:03 pm (मेरी नज़्म)

पहले भी उसे कई बार देखा है मैंने
कभी मुस्कुराते कभी इठलाते, दोस्तों में…

उसका चेहरा कभी यूँ तो ख़ामोश न था
जैसे मुझसे कुछ कहना चाह रहा हो,
या फिर मेरे चेहरे से कुछ ऐसा पढ़ लिया
जिसे उसने पहले कभी पढ़ा नहीं…

क्या बात थी, क्यों स्तब्ध था वो चेहरा
बिन कुछ कहे मुझसे इक अधूरी कहानी कह गया
या फिर उसके मन में मुझसे जुड़ी कोई पीड़ा थी
मैं जानता हूँ वो कभी कहेगा नहीं…

मगर फिर भी उसने कुछ तो कहा था
कुछ कोशिश की थी,
ऐसा पहले तो मैंने नही देखा उसे…

शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००४

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दर्द की तहरीरें

September 20, 2007 at 6:38 am (मेरी ग़ज़ल) (, , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , )

मैं जो तुम्हें देखता हूँ मुझको देखती हैं तेरी तस्वीरें
साँस लेता हूँ मगर कमनसीब हैं हाथों की लक़ीरें

न ही कोई रब्त न ही रिश्ता न मरासिम न बंधन
फिर मेरे मन में पड़ रही हैं किसकी तसलीम की ज़ंजीरें

पाँव मोड़ दर मोड़ चलके इस मोड़ तक आये थे
शायद इसीलिए नाकाम हैं खा़हिशों की सारी तदबीरें

जबींसाई से कब मिटा है माथे का लिखा हमनफ़सों
ये दिल शबो-रोज़ खु़द लिखता है दर्द की तहरीरें

नसीब है फ़ासला, हिज्र या फ़ुरक़त’ कुछ भी कह लो
वरना जुड़ जाती दो अजनबी आश्ना दिलों की तक़दीरें

‘नज़र’ शब कहीं न समा जाये दर्द की गहराई में
मैं जो उसे देखता हूँ मुझको देखती हैं उसकी तस्वीरें


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: १२/११/२००४

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दिल में तेरे लिए सच्ची अक़ीदत है

September 20, 2007 at 6:37 am (मेरी ग़ज़ल) (, , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , )

है जो किसी से तुम्हें तो गुल से निस्बत है
तुम मुझको मिले हो ये मेरी क़िस्मत है

तेरे तब्बसुम से ही है ये रंगे-बहार
लगता है अब जैसे सारी फ़िज़ा जन्नत है

तेरी आँखों की गुलाबी डोरियाँ जैसे नश्शा-ए-मै
तिश्ना-लब हूँ मुझे पीने की हसरत है

तेरी ज़ुल्फ़ों से गुज़रते देखी है मैंने सबा
हाए ये सबा भी कितनी खु़श-क़िस्मत है

तेरे अबरू मानिन्दे-कमान उठते हैं
मुझको तेरे आगोश में मरने की चाहत है

तेरे लब हैं की पंखुड़ियाँ गुलाब की हैं
इक बोसा पाने को शबो-रोज़ की मिन्नत है

सुना है जन्नत की हूरों के बारे में बहुत
मगर उनमें कहाँ ये कशिशे-क़ामत है

देखा है तुमने कभी चाँद को सरे-शाम
एक वही है जो तेरी तरह खू़बसूरत है

हो तुम ही मानिन्दे-खु़दा मेरे लिए
दिल में तेरे लिए सच्ची अक़ीदत है

तुम क़रीब होते हो दर्द मिट जाते हैं
तुमसे ही मुझको होती नसीब फ़रहत है

तुम्हें देखा तो मैंने अपनी ज़िन्दगी देखी
तुमको चाहना ही खु़दा की इबादत है

मेरा दिल जितना चाहता है तुमको सनम
तुम्हें भी मुझसे उतनी ही मोहब्बत है


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २६/०७/२००४

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तेरे चेहरे पर अपनी नज़र ढूँढ़ते हैं

September 20, 2007 at 6:35 am (मेरी ग़ज़ल) (, , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , )

हर गली हर कूचा दर-ब-दर ढूँढ़ते हैं
हम अपनी दुआ में असर ढूँढ़ते हैं

तुम देखकर हँसते हो मुझे और हम
तेरे चेहरे पर अपनी नज़र ढूँढ़ते हैं

कौन दूसरा होगा हम-सा सितम-परस्त
हम अपना-सा कोई जिगर ढूँढ़ते हैं

जो राह मंज़िल तक पँहुचती होगी
तेरी चाहत में ऐसी रहगुज़र ढूँढ़ते हैं

धूप छुप गयी है कोहरे से भरी वादियों में
और हम हैं कि तेरा नगर ढूँढ़ते हैं

तुमने कहा नहीं कि कब आओगे तुम
हम तुझे अपनी राह में मगर ढूँढ़ते हैं


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २६ जुलाई २००४

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हमने अबस की आरज़ू छोड़ दी

September 20, 2007 at 6:34 am (मेरी ग़ज़ल) (, , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , )

हमने अबस की आरज़ू छोड़ दी
तुमको पाने की जुस्तजू छोड़ दी

चाक़ जिगर को गरेबाँ में छिपाके
हमने हसरते-रफ़ू छोड़ दी

बुलाता रहा माज़ी पलट-पलट के
मगर अब इश्क़ की खू़ छोड़ दी

मैं हूँ अधूरी खा़हिशों का मुब्तिला
ग़ालिबन हमने वो बाज़ू छोड़ दी

है आज मौसम बदला-बदला
वो गुफ़्तार वो गुफ़्तगू छोड़ दी

हर  जगह पाओगे तुम मुझको
मैंने मेरी नज़र चार-सू छोड़ दी


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: ३१ जुलाई २००४

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