हवा में इक ताज़ा खु़शबू है
कुछ पुरानी यादों की,
आज सारी रात जागूँगा
सारी रात याद करूँगा तुम्हें
इस उम्मीद पर कि शायद
हिचकी के वक़्त कुछ नामों के बीच
मेरा भूला हुआ नाम
तुम्हारी ज़ुबाँ से तुम्हारे लबों पर आ जाए
शायद इसी बहाने
तुम मुझे याद कर लो
शायद यूँ कभी याद किया न हो… तुमने मुझे
अगर नहीं किया तो क्यों
मैं तुम्हारी साँसों का कभी एक क़तरा…
रह चुका हूँ
साँस जिससे जिस्म में जान है
हाँ वही हूँ मैं
जिसकी तुम्हें ज़रूरत तो है
मगर उसका एहसास नहीं…
शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
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दुनिया में अपनी हसरतों का मारा हुआ
शायद इक मैं ही हूँ
वरना तो उदासियों की भीड़ में
हर चेहरा खु़श ही नज़र आता है
चाहे वो खु़शी दर्द के चेहरे पर
कोई नक़ाब ही क्यों ना हो…
चलो खु़श तो है झूठे ही सही
इस झूठी खु़शी के बीच
उसे कोई न कोई इक पल खु़शी का
ज़ुरूर मिल ही जाता होगा
खु़शनसीब होते हैं ऐसे लोग
जिन्हें खु़शी का इक भी नसीब होता है
मुझे तो बस चाहत के बदले में
यह हसरतें मिलीं हैं
शायद इक रोज़ यह सीने में दफ़्न हो जायें
वरना मुझे तो दफ़्न होना ही है…
शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
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ज़िन्दगी
उम्र के दरिया में बहते हुए
मँझधार-मँझधार जाने कहाँ
बहती जा रही है…
शायद अपनी हसरतों में मुब्तिला है
और कुछ नहीं उसकी दुनिया में,
बस कुछ चंद हसरतें हैं
हसरतें जाने कब पूरी हों
कब ज़िन्दगी को धीमी मँझधार वाला
कोई आगोश कोई साहिल मिले…
शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
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एक कहानी…
जिसमें कोई किरदार नहीं,
एक बादल जिसमें नमी की एक बूँद नहीं,
एक समन्दर…
जिसमें सब कुछ है,
जिसके लिए कुछ नहीं,
और ऐसा ही सब कुछ…
शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
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एक उदास आरज़ू
रेत के मैदान में
दौड़ते-दौड़ते थक गयी
उसे कोई हमदर्द
कोई साया नहीं मिला
मेरा दिल भी एक रेगिस्तान है
एक आरज़ू जो उदास है
कबसे भटक रही है
कोई निशाँ कोई नाम पाने के लिए
मगर रेगिस्तान की आँधियों के बीच
क्या भला कोई कभी कुछ ढ़ूँढ़ पाया है
जो इस बेचारी उदास आरज़ू को मिलेगा
नासमझ है, समझती ही नहीं
न जाने किसलिए गर्द के ग़ुबार में
इक भँवर के साथ भटक रही है
शायद कोई नाम मिले
शायद कोई निशाँ मिले
शायद कोई तस्वीर ही…
जिससे यह जुस्त-जू ख़त्म हो
शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
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सूरज सारा दिन महकता रहा
चाँद शबभर सुलगता रहा
सितारों की कलियाँ जगमगाती रहीं
दिन डूबा तो रात बिखरने लगी
अपने अरमानों के आगोश में बैठा
मैं ख़ाबीदा तुझे देख रहा हूँ…
शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
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न सुबह आयी न शाम आयी
मैं दोपहर की तेज़ धूप में भटकता रहा
सहराँ की रेत-सी यह ज़िन्दगी तपती रही
सूरज़ ग़ुरूर था बहुत
छाँव का कोई शज़र दूर तक दिखा ही नहीं
बंजर सूखी ज़मीन पर पानी के सब निशाँ सूख चुके थे
ज़मीन में बची थी महज़ तपिश
ज़िन्दगी के साथ-साथ जिस्म भी तपता रहा
न सुबह आयी न शाम आयी
मैं दोपहर की तेज़ धूप में भटकता रहा
शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
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