ऐजाज़ है तब्बसुम का…
उसकी पाज़ेब हाथों में है तो कुछ भी कहती नहीं
उसके पाँव में झनकती थी तो अनकही बातें कहती थी
पत्तों पर बूँदों की तरह गिरते छम-छम करती बजती थी
बदन में उसके लिए साँसों की एक लड़ी है
बजती रहती है सीने में हर पल हर घड़ी…
उसका नाम ही बजता है मेरी साँसों में
भूलता नहीं उसको भूलने के बाद भी क्यों…
वो हवा है, खु़शबू है, फ़िज़ा है, रंग है, ऐजाज़ है तब्बसुम का…
माहे-नख़्शब है चाँद उसके आगे,
वो शुआ है, सजदा है, आमीन है, दुआ है, वो ज़िन्दगी है, जान है…
बावला हूँ मैं उसके इश्क़ में
शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’