Archive for August 29th, 2007

दर्द और तस्कीं

देखिए दर्द कब तक मुझको सहे
कब तक इठलाये मुझसे
मैं जो रूठा हूँ कब तक मनाये
कभी तो तंग आयेगा मुझसे
देखिए कब छोड़कर जाये
वक़्त रोशनी है
मैं तन्हा जिस्म हूँ
और दर्द परछाईं है
देखिए वक़्त, मैं और दर्द में
कब तक यह नाता रहे
कब तक ज़ख़्म लहू रुलाये
दर्द की ख़ू है ‘तन्हाई’ और ‘ज़ख़्म’
जब तन्हाई होगी
ज़ख़्म को जगह मिलेगी ही
दिल [...]

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वो ऐजाज़ है तब्बसुम का

उसकी पाज़ेब आज मेरे हाथों में है तो
लबों से कुछ कहती नहीं, ख़ामोश है
उसके पाँव में झनकती थी तो
मुझसे अनकही बातें कह दिया करती थी
पत्तों पर गिरती बूँदों की तरह
पिछ्ली बारिशों में छम-छम बजती थी
बदन में उसके लिए साँसों की एक लड़ी है
बजती रहती है सीने में हर पल हर घड़ी
उसका नाम ही बजता है [...]

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मेरी आख़िरी जिजीविषा…

क्या आज उसने सच कहा
क्या मुझे ‘तुम्हें’ भूल जाना चाहिए
क्या वह तुम ही हो
जिसने मेरी सोच का दायरा बाँध दिया है
क्या सचमुच ऐसा ही है
क्या तुमसे आज़ाद होकर मैं
एक क़ामयाब शख़्स हो पाऊँगा
क्या ऐसा है कि मैं तुम्हें भूलकर
कोई खु़शी कोई मंज़िल पा सकूँगा
क्या मेरी दुनिया तुम बिन
किसी नयी सोच के साथ
इस तरह फिर कभी [...]

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इक बदन की ख़ाहिश लिए

बहुत उदास था मैं आज सारा दिन
सोचा कि थोड़ी देर तुमसे बात कर लूँ
सो ज़रिया-ए-नज़्म…
तुमसे बात कर रहा हूँ…
सोचा जब कभी मिलोगी
यह नज़्म खु़द पढ़ लोगी,
तुम्हें आदत जो है
बिन माँगे मेरी किताब पढ़ने की…
खु़द से सारा दिन बचता फिरता रहा
कहीं जो कोई हमदर्द मिला
तो बस… दो पल के लिए…
मुझसे लोग अक्सर ऐसे ही मिलते हैं…
तुम्हारे [...]

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वरना तो दिल में…

अच्छा हुआ तू मेरे सीने में
दर्द बनके साँस लेती है
वरना तो दिल में…
हज़ार दर्दों को पनाह मिल जाती…
तेरा दर्द तो मेरा हम दर्द है
जाने दुनिया के दर्द
हमदर्द होते…
या तन्हाई में मुझे काटने दौड़ते
तेरा शुक्रिया कैसे अदा करूँ
तुमसे जीने का बहाना
और मरने की वज़ह
दोनों मिलीं हैं
अच्छा हुआ तू मेरे सीने में
दर्द बनके साँस लेती है
शायिर: विनय [...]

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