न सुबह आयी न शाम आयी
मैं दोपहर की तेज़ धूप में भटकता रहा
सहराँ की रेत-सी यह ज़िन्दगी तपती रही
हर ख़्याल हर ख़ाब में तेरा ही अक्स था
सूरज़ ग़ुरूर था बहुत
छाँव का कोई शज़र दूर तक दिखा ही नहीं
बंजर सूखी ज़मीन पर
पानी के सब निशाँ सूख चुके थे
ज़मीन में बची थी महज़ तपिश
ज़िन्दगी के साथ-साथ जिस्म भी तपता रहा
न सुबह आयी न शाम आयी
मैं दोपहर की तेज़ धूप में भटकता रहा
शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’




















Posted by manju on October 21, 2009 at 10:38 AM
bahut sundar rachna vinay ji aap ko dhero subhkaamna