तो शायद साँस पड़ जाये इनमें…

एक पानी में भीगी हुई किताब
जाने किसने?
सूखने के लिए रख दी है धूप में

जैसे जैसे नमी भाप बनती है
पन्ने फड़फड़ाकर खुलने लगते हैं
नीली स्याही से लिखे हर्फ़
भीगने से धुँधले पड़ गये हैं और…

चश्मा लगाकर भी
इन आँखों से पढ़ नहीं मिलते हैं
जाने किसकी ज़िन्दगी के हर्फ़ हैं?
धुँधले, पानी में धुले हुए हर्फ़

वो, वही जिसने लिखे थे
कलम फेर दे अगर
तो शायद साँस पड़ जाये इनमें…


शायिर – विनय प्रजापति ‘नज़र’

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