दर्द और तस्कीं

August 29, 2007 at 7:03 pm (मेरी नज़्म)

देखिए दर्द कब तक मुझको सहे
कब तक इठलाये मुझसे
मैं जो रूठा हूँ कब तक मनाये
कभी तो तंग आयेगा मुझसे
देखिए कब छोड़कर जाये

वक़्त रोशनी है
मैं तन्हा जिस्म हूँ
और दर्द परछाईं है
देखिए वक़्त, मैं और दर्द में
कब तक यह नाता रहे
कब तक ज़ख़्म लहू रुलाये

दर्द की ख़ू है ‘तन्हाई’ और ‘ज़ख़्म’
जब तन्हाई होगी
ज़ख़्म को जगह मिलेगी ही
दिल की किसी दीवार पर,
और तब दर्द महकेगा मुस्कुरायेगा

तस्कीं… तस्कीं ही रहेगी
और दर्द… दर्द ही रहेगा
वक़्त की धूप-छाँव में
यह दोनों साँस लेते रहेंगे


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’

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ऐजाज़ है तब्बसुम का…

August 29, 2007 at 6:46 pm (मेरी नज़्म)

उसकी पाज़ेब हाथों में है तो कुछ भी कहती नहीं
उसके पाँव में झनकती थी तो अनकही बातें कहती थी
पत्तों पर बूँदों की तरह गिरते छम-छम  करती बजती थी

बदन में उसके लिए साँसों की एक लड़ी है
बजती रहती है सीने में हर पल हर घड़ी…
उसका नाम ही बजता है मेरी साँसों में
भूलता नहीं उसको भूलने के बाद भी क्यों…

वो हवा है, खु़शबू है, फ़िज़ा है, रंग है, ऐजाज़ है तब्बसुम का…
माहे-नख़्शब है चाँद उसके आगे,
वो शुआ है, सजदा है, आमीन है, दुआ है, वो ज़िन्दगी है, जान है…
बावला हूँ मैं उसके इश्क़ में


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’

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मेरी आख़िरी जिजीविषा…

August 29, 2007 at 6:22 pm (मेरी नज़्म)

क्या आज उसने सच कहा
क्या मुझे ‘तुम्हें’ भूल जाना चाहिए
क्या वह तुम ही हो
जिसने मेरी सोच का दायरा बाँध दिया है
क्या सचमुच ऐसा ही है
क्या तुमसे आज़ाद होकर मैं
एक क़ामयाब शख़्स हो पाऊँगा
क्या ऐसा है कि मैं तुम्हें भूलकर
कोई खु़शी कोई मंज़िल पा सकूँगा
क्या मेरी दुनिया तुम बिन
किसी नयी सोच के साथ
इस तरह फिर कभी हसीन होगी
क्या आज उसने सच कहा कि
मैं तुम्हारे पीछे दौड़ते-दौड़ते
अपनी राहे-मंज़िल से भटक गया हूँ
क्या उसकी यह बात मुझे मान लेनी चाहिए
और तुम्हें भूल जाना चाहिए
आख़िर वह ऐसा क्यों कह रहा है
उसका मक़सद क्या है
क्या उसने सचमुच एक दोस्त की तरह बात की
या फिर जिस तरह से वह दूसरों से
अपने रिश्तों को नहीं रखता
उसी तरह से वह मुझसे
मेरी आख़िरी जिजीविषा भी छीन लेना चाहता है
मगर क्यों आख़िर क्यों
मैं यह सवाल खु़द से कर रहा हूँ
क्या आज उसने सच कहा

नहीं वह झूठा है… बातिल है…
मुझे उसकी बातों में नहीं आना चाहिए
हाँ यही ठीक है…


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’

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इक बदन की ख़ाहिश लिए

August 29, 2007 at 6:06 pm (मेरी नज़्म)

बहुत उदास था मैं आज सारा दिन
सोचा कि थोड़ी देर तुमसे बात कर लूँ
सो ज़रिया-ए-नज़्म…
तुमसे बात कर रहा हूँ…

सोचा जब कभी मिलोगी
यह नज़्म खु़द पढ़ लोगी,
तुम्हें आदत जो है
बिन माँगे मेरी किताब पढ़ने की…

खु़द से सारा दिन बचता फिरता रहा
कहीं जो कोई हमदर्द मिला
तो बस… दो पल के लिए…
मुझसे लोग अक्सर ऐसे ही मिलते हैं…
तुम्हारे सिवा…

तुम्हें भूल जाने की कड़वी बातें
मेरा पीछा करती रहीं,
और मैं सारा दिन…
तन्हाई से भागता रहा

आख़िर रात हुई
और मैं फिर तन्हा हूँ
मुझे तुम पागल कह लेना
चाहो तो दीवाना भी

पर सच तो यह है कि
मैं तुमसे प्यार करता हूँ
और…
हमेशा-हमेशा करता रहूँगा…

बदन भटकता है तड़पता है
इक बदन की ख़ाहिश लिए
मगर मैं हाँ मैं तड़पता हूँ
तुम्हारे खा़ब… तुम्हारे एहसास…
तुम्हें पाने के लिए

मुझे छोड़कर तुम कहीं मत जाना
कहीं मत जाना यही इल्तिज़ा है


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’

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वरना तो दिल में…

August 29, 2007 at 5:37 pm (मेरी नज़्म)

अच्छा हुआ तू मेरे सीने में
दर्द बनके साँस लेती है
वरना तो दिल में…
हज़ार दर्दों को पनाह मिल जाती…

तेरा दर्द तो मेरा हम दर्द है
जाने दुनिया के दर्द
हमदर्द होते…
या तन्हाई में मुझे काटने दौड़ते

तेरा शुक्रिया कैसे अदा करूँ
तुमसे जीने का बहाना
और मरने की वज़ह
दोनों मिलीं हैं

अच्छा हुआ तू मेरे सीने में
दर्द बनके साँस लेती है


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’

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