‘Women are beautiful desires not the object of lust…’
Respect ladies because they make your world beautiful.by Vinay Prajapati
Penned: 07/01/2013
ख़ुद-फ़रेबी हूँ
मैं बारहा जज़्बाती होकर क्यों उसका ज़िक्र कर देता हूँ? क्यों ये तूफ़ान दिल में थमकर नहीं रहता? क्यों ये सुनाना चाहता हूँ कि उसने मेरे साथ क्या किया? क्यों आख़िर क्यों ये सब मेरे साथ हो रहा है? उसे भूल जाता हूँ, मगर जब उसका चेहरा मुझे एक उदासी के पीछे ख़ामोशी से ढका हुआ दिखता है, तो क्यों, उसकी उतरी हुई सूरत मुझसे कुछ कहने की कोशिश करती है? क्यों ये हर दफ़ा महसूस होता है मुझे… जब मेरी नज़र उससे बचती है तो उसकी नज़र मुझे पकड़ लेती है? क्यों ये मालूम होता है कि जिस तरह से मैं उसे नज़र अंदाज़ करता हूँ वो करके भी नज़र अंदाज़, मुझे देखती है? अगर उसे इस ‘क्यों’ का जवाब मालूम है तो क्यों वो मुझे नहीं देती? वो उस हर एक शख़्स से बात करती है जिससे मैं करता हूँ मगर क्यों जो कहती है उनसे… मुझे देखकर कहती है, दिखाकर कहती है? वो आज उस हर एक से बात करती है जो उसे बुरा कहते थे, क्यों आज उस हर एक के पास बैठती है जो आज भी उसके बारे में बुरा सोचते हैं?
उसकी एक सहेली ऐसा लगता है कि मुझसे कुछ कहना चाहती है, अगर नहीं तो क्यों… इतना ग़ौर से देखती है मेरी जानिब? मैं इतना भी कठोर नहीं जितना वो मुझको समझती है। नहीं मैं नहीं जानता कि वह अगर मुझसे आकर बात करे तो मैं उससे क्या कहूँगा क्योंकि मैं ख़ुद से अजनबी, ख़ुद-फ़रेबी हूँ, अगर मैं ऐसा हूँ तो क्यों हूँ?
[Dead Letter] about MV
Penned on 31 दिसम्बर 2004
फ़िज़ा में रंग घुल जाते हैं
मैं कभी सोचता हूँ कि
मेरी दुनिया क्या है?
ये दिल है
जो प्यार जैसे हुस्न के लिए तड़पता है
या वो
जिसका नाम ज़ुबाँ पर आते ही
फ़िज़ा में रंग घुल जाते हैं…
इक रोज़ मेरी मोहब्बत तारीख़ होगी
मेरी बात बारीक़ से भी बारीक़ होगी
मैं इश्क़ की जिस हद से गुज़र गया हूँ
क्या तू कभी उसमें शरीक़ होगी
शुआ किस सहर का इंतज़ार करती है
शायद तेरी नज़र से तख़लीक़ होगी
तेरी सादगी के सदक़े मरना चाहता हूँ
क्या कोई नीयत इतनी शरीफ़ होगी
मोहब्बत जो करे कोई तो रूह से करे
वरना बादे-मर्ग तकलीफ़ होगी
Penned on 01 January 2005
मैं और तुम कभी आशना थे
पिछली रात तेरी यादों की झड़ी थी
मन भीग रहा था
जैसे-जैसे रात बढ़ती थी
चाँद से और जागा नहीं जा रहा था…
बेचारी नींद!!!
आँखों से यूँ ओझल थी
जैसे कि कुछ खो गया हो उसका
जब आँखों में नींद ही नहीं थी
तो क्या करता…?
तुम में मुझमें जो कुछ था
उसे तलाशता रहा सारी रात
सारी कहानी उधेड़कर फिर से बुनी मैंने
तुमने कहाँ से शुरु किया था
कुछ ठीक से याद नहीं आ रहा था
नोचता रहा सारी रात अपने ज़ख़्मों को
ज़ख़्म ही कहना ठीक होगा
दर्द-सा हो रहा था
साँस बदन में थम-थम के आ रही थी
कभी आँसू कभी ख़लिश
तुमने ग़लत किया – या मुझसे ग़लत हुआ
कोई तो रिश्ता था
जिसमें साँस आने लगी थी
मगर किसी की नज़र लग गयी शायद…
साँस तो आ चुकी थी मगर
रिश्ता वो अभी नाज़ुक़ था
अगर मैं कुछ कहता तो तुम कुछ न सुनती
न कुछ मैं समझने के मन से था
वक़्त बीतता रहा
जो तुम कर सकती थी – तुमने किया
जो मैं कर सकता था – मैं कर रहा हूँ
फिर भी तुम्हारी आँखों का सूखा नमक
यादों की गर्द के साथ उड़ता हुआ
मेरे ताज़ा ज़ख़्मों को गला रहा है
जाने किसका कसूर है
जिसको तुम भुगत रही हो
जिसको मैं भुगत रहा हूँ
एक दोस्ती से ज़्यादा तो मैंने कुछ नहीं चाहा
तुमको जितना दिया
तुमसे जितना चाहा…
सब दोस्ती की इस लक़ीर के इस जानिब था
वो कैसा सैलाब था?
जिसमें तुम उस किनारे जा लगे
मैं इस किनारे रह गया
और हमेशा यही सोचता रहा
कि तुम मिलो तो तुम्हें ये एहसास कराऊँ
कि तुमने क्या खोया
मैं सचमुच नहीं जानता कि
तुम किस बात से नाराज़ हो,
तुम्हारे ख़फ़ा होने की वजह क्या है?
मगर ये एहसास-सा है मुझको
कि तुम किसी बात के लिए कसूरवार नहीं हो
अगर मैं ये समझता हूँ
तुम इसे सोचती हो
तो दरम्याँ यह जो एक रास्ता है
तुम्हें दिखायी क्यों नहीं देता
पहले अगर तुमने पिछली दफ़ा बात की थी
तो इस दफ़ा क्यों नहीं करती
क्या वो दोस्ती फिर साँस नहीं ले सकती
क्या इन ज़ख़्मों का कोई मरहम नहीं
क्यों वो मुझे इस तरह से देखती है
जैसे कि तुम उससे कहती हो
“ज़रा देखकर बताना तो! क्या वो इधर देखता है?”
अगर मेरे पिछले दो ख़ाब सच हुए हैं
तो ज़रूर मेरे ऐसा लगने में
कुछ तो सच ज़रूर छिपा होगा
मैंने कई बार महसूस किया है
तुमको मेरी आवाज़ बेकस कर देती है
तुम थम जाती हो, ठहर जाती हो
कोशिश करते-करते रह जाती हो
कि न देखो मुझको -
मगर वो बेकसी कि तुम देख ही लेती हो
मैं कल भी वही था
मैं आज भी वही हूँ
मुझे लगता है कि तुम भी नहीं बदली
फिर क्यों फर्क़ आ गया है
तुम्हारे नज़रिए में -
मैं जानता हूँ ये नज़रिया बनावटी है, झूठा है
आइने की तरह तस्वीर उलट के दिखाता है
कभी-कभी ख़ुद को समझ पाना
कितना मुश्किल होता है
ऐसे में दूसरों का सच परखना सचमुच मुश्किल है
मैं यहाँ आकर आधी राह पर
सिर्फ़ तुम्हारे लिए ठहर गया हूँ
आधा चलकर मैं आ गया हूँ
बाक़ी फ़ासला तुम्हें कम करना है
मेरी आँखों में पढ़ लो सच -
ये अजनबी तो नहीं
कभी तो तुम भी इनसे आशना रह चुकी हो
सारी बात झुकी हुई आँखों में है
अपनी होटों से कह दो -
‘मैं और तुम कभी आशना थे’
Penned on 01 January 2005
उलझे हुए दिल में तेरी कमी-सी क्यों है
उलझे हुए दिल में तेरी कमी-सी क्यों है
क्या बात है आँखों में नमी-सी क्यों है
तेरी किस बात से यह दिल थम गया
दिल में हर धड़कन सहमी-सी क्यों है
क्या हुआ किस बात से ये दिल टूट गया
टूटे हुए दिल में ये नरमी-सी क्यों है
हमने देखा है तुम्हें हमें देखते हुए
चाहत में इतनी ग़लतफ़हमी-सी क्यों है
रूठे तुम तो फिर मानते भी नहीं हो
तेरे मिज़ाज में इतनी गरमी-सी क्यों है
Shayir: Vinay Prajapati Nazar
Penned on 01 January 2005
तो उसका ये डर मिटे
बहुत दिन हुए ढलती रात पे सहर का सुनहरा रोगन मैंने चढ़ते नहीं देखा। तुम थे तो तुम्हें देखने के लिए इसे रोज़ बालिश्त-बालिश्त खेंचता था। उतरती थी धीरे-से रात, चाँद भी अलविदा कहके सूरज की किरनों में खो जाता था। तुम जब नहीं तो इन सब में मेरा दिल नहीं लगता… बदन में कुछ ज़ख़्म हैं जो साँस लेते रहते हैं। तुम्हारे जाने से जो हालत हुई है अब उससे उबरना चाहता हूँ मैं…। चाहता हूँ कि खुले आसमाँ के परों के नीचे बदन को साँसों से जाविदाँ कर दूँ। मगर जो ज़ख़्म वक़्त ने बुझाये हैं उन्हें लोग अपने नाख़ूनों से नोंच-नोंच के हरा कर देते हैं। आँखें लहू में भीग जाती हैं, साँस बदन में लहू-लुहान उतरती है, चुभती है सीने में एक निश्तर की तरह, मैं बस तड़प के रह जाता हूँ। चीखता हूँ… कोई सुनता नहीं इस बेकसी की पुकार को। चाहत है मुझे कोई साँस दे दे, ऐसी साँस जिसमें दोस्ती की ख़ुशबू हो, मेरे हाथों में अपना हाथ दे दे जिसमें उम्मीद का हौसला हो। क्या तुम बिन इस दुनिया में कोई ऐसा नहीं… जो तुम्हारी कमी को पूरा कर दे, ये सोती हुई कुछ पाने की हवस को ज़िंदा कर दे। तुम नहीं मिलती तो क्या अपनी घुटन में ख़ुद के साथ-साथ मैं अपनी तमन्नाओं का गला भी घोंट दूँ? ये कहाँ तक सही है, तुम कुछ कहती क्यों नहीं? तुम नहीं मिलती तो ये दुआ करो कि मुझे कोई तुमसा दूसरा मिल जाये। मैं तुम्हारी ख़ुशी से ख़ुश हूँ तो तुम्हें मुझसे जलन क्यों है? किसी तरह तुम मेरा साथ दे दो। यूँ घुट-घुटके मुझसे अब और नहीं जिया जाता, निजात दे दो मुझे निजात…। अपने लिये न सही, मेरे अपनों के लिए, जिन्हें मुझसे उम्मीदें हैं। दूसरों के ज़ख़्म ढोते-ढोते, इक छाती सहलाने वाले हाथ की ज़रूरत मुझे भी महसूस होने लगी है। अब बस और नहीं हारना चाहता, जीतने का कोई बहाना चाहता हूँ यानि किसी बहाने तो जीतना चाहता हूँ, अपने लिए न सही अपनों के लिए। तुम-सी तो नहीं मगर फिर भी वो मुझे जीता सकती है, ऐसा ही लगता है। कुछ तो था जो उसमें जो मैं उसकी तरफ़ बेबस-सा होकर बस खिंचता ही चला गया। कहा भी उससे हाले-दिल, ख़ुतूत में लिखकर भी दिया उसे। उसकी हाँ सी लगती है मगर वो डरे-डरे कँप कँपाते होंठों में दबी-सी है। शायद रूबरू कुछ किसी वादे के साथ कहूँ तो उसका ये डर मिटे… काश! कह सकूँ कोई ये मौका दे दे।
[Dead Letter] to SS
Penned on 02 जनवरी 2005
उसकी आँखें
मैंने कभी उससे बात नहीं की मगर क्यों उसकी आँखें मुझको पहचानती हैं?
क्या जानती हैं मेरे बारे में, क्या जानना चाहती हैं उसकी आँखें?
कभी आश्ना तो कभी अजनबी लगती हैं उसकी आँखें, मानूस आँखें!
उसकी आँखें पहचानती हैं मुझे, मगर कुछ कहती नहीं…
वो गुज़रती है जितनी बार सामने से -
एक बार तो मुड़ती हैं, उठके झुक जाती हैं, उसकी आँखें
उनकी कशिश कमसकम एक दफ़ा तो अपनी जानिब खींच ही लेती है
मेरी बेज़ुबाँ आँखें चाहकर भी उससे कह नहीं सकतीं कि…
उसकी आँखें कितनी ख़ूबसूरत हैं, उसकी आँखों की कोई तफ़सील नहीं…
(DB के नाम)
Penned on 31 Dec 2004
